आत्माराम यादव वरिष्ठ पार्कर चीफ एडिटर हिन्दसंतरी डाटकाम
मुझे तोड़ लेना बनमाली,
उस पथ में देना तुम फेक ।
मातृभूमि पर शीश चढाने,
जिस पथ जाएँ वीर अनेक ।
दादा माखनलाल चतुर्वेदी को देश के मूर्धन्य साहित्यकारों ने यूं ही भारतीय आत्मा नही कहा है। अगर वे साहित्य के देवता कहलाए है तो यह उनकी तपस्या थी जो शब्दों के शब्दकोश से शब्दों को चुनते समय अपनी रचना को जीवंत कर दिया करते थे। जब उन्होने पुष्प की अभिलाषा कविता लिखी तब उन्होने पुष्प के मन में प्रवेश कर यह भाव लिखे जिसमें एक फूल की चाह व्यक्त करते हुये उन्होंने फूल के मन की बात की ओर राष्ट्रीय निष्ठा और मातृभूमि को लिए खुद को बलिदान होने वाले देश के सच्चे सपूतों के चरणो तक फूल के पहुँचने की अभिलाषा में फूल की प्रसन्नता व्यक्त की। देशभक्त के साथ माखनलाल चतुर्वेदी एक उत्कृष्ट साहित्यकार थे जिन्होने फूल/सुमन के माध्यम से अपनी चाह भी जगजाहिर कर दी । आज 4 अप्रैल को हिन्दी साहित्य-तपोवन के ऋषि दादा माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म दिन है इस अवसर पर उनके प्रति अपने करकमलों से शाब्दिक लेखन से श्रद्धा अर्पित कर उनके चरणों में नतमस्तक हूँ, हालांकि जागतिक श्रद्धा देश की संस्कारशील राष्ट्रीय निष्ठा के लिये दादा माखनलाल चतुर्वेदी के कर्मवीर उन्हे अनेक भांति साहित्य-सौरभ बिखेरकर काव्य के माध्यम से याद करने को विस्मृत नहीं कर पाते है। डॉ॰शिवमंगल सिंह सुमन ने माखनलाल चतुर्वेदी के निधन पर लिखा था कि वे साहित्य के देवता थे, हिन्दी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगला, तमिल आदि के विद्वान भी उसके द्वार पर आकार कृतार्थ होते थे।
मानव के गौरव और मानवीय आस्था में मोहनलाल जी का चरम विश्वास था। उनके काव्य-जीवन के प्रथम चरण में भी राष्ट्रीय कविता में मानवतावाद की अन्तरव्यापी धारा अपनी उन्मुक्त, निश्छल और बाद रहित स्थिति में उपलब्ध होती है। यह आश्चर्य की ही बात है कि उनकी एक भी कविता संकुचित राष्ट्रवाद को अभिव्यक्ति नहीं देती। राष्ट्रवाद की उनकी उदात्त सर्व मंगलकारी भूमि स्वत ही अनूठी और अभूतपूर्व है, और इस तरह राष्ट्रीय-सांस्कृतिक काव्य की अभिव्यक्ति मे भी उनका मौलिक अवदान छुप नहीं पाता । एक मन मुग्धकारी रहस्यमयता से अनुप्राणित होने के कारण वह एक और समर्पण के आदर्श को व्यक्त करता है तो दूसरी ओर आत्मार्पण के सौन्दर्य को। राष्ट्रीयता और रहस्यवाद एक बडी ही सुन्दर और रगीन रेशमी डोर से बंधे हुए है। इस काल में जहाँ एक ओर राष्ट्रीयता केवल आत्म-विर्सजन तक सीमित नहीं रह गई, वही दूसरी ओर रहस्यवाद किसी वैयक्तिक परिवेश में घिरा न रहकर सार्वजनिक काव्य का विषय बन गया है।” माखनलाल जी के काव्य की मौलिक विशेषताएँ अगणित है। ओज और माधुर्य परस्पर विरोधी गुण है पर उन्होने प्राय सर्वत्र ही इन दोनो के विरोध को सुन्दर समन्वयात्मक उपस्थिति प्रदान करने में दुर्लभ सफलता प्राप्त की है।
दादा माखनलाल चतुर्वेदी नर्मदापुरम जिले की बाबई तहसील के एक मोहल्ले में जन्मे थे ओर बचपन में नर्मदा नदी पार करके ग्राम नांदनेर पढ़ने जाना पड़ा था, इसी नर्मदा की लहरों को उन्होने शब्दों का सागर बना लिया ओर जीवन मार्ग पर वे शब्दकोश की नाव पर सवार हो गये। उनके शब्द जब कर्मवीर में छपते तो अंग्रेज़ सरकार खुद को डूबता हुआ देखती। उनके बचपन का एक प्रसंग है –माखन लाल बाबई ग्राम के एक साधारण वैष्णव परिवार में पैदा हुये। उनके पिताजी हिन्दी, उर्दू फारसी और संस्कृत के ज्ञाता थे ओर जिले के छिदगाव की प्राइमरी पाठशाला में शिक्षक थे। घर मे माखन की बुआ थी जो भगवान की बडी भक्त थी। वे माखन को बहुत चाहती थी और उनके पालन-पोषण मे इसकी अधिक रुचि थी। बचपन में बालक माखन उन्ही के पास सोया करता था। भोर होने पर, नींद खुलने पर, उनके गीतों के स्वर उनके कानो में गूंजते थे ‘जागिये रघुनाथ कुंवर पंछी वन बोले ।” भोर की बेला मे यह पद उन्हें सुनने मे बहुत भली लगता था और एक दिन बर-बस ही बालक माखन ने शाल ओढे-ओढे यह तुकबन्दी कर डाली- “उठो मेरे दोनो बैल, भोर भयो प्यारे करो तुम जंगल की सैर, जंगल बसे घास अब तो छोडो घर की आस भोर भयो प्यारे।’ बस साहित्य के देवता की इस साहित्य की धुन के कारण घर में धुनाई हुई किन्तु साहित्य की धारा लिखने के लिए अविरत प्रभावित होने लगी। वर्ष 1943 में उस समय का हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा ‘देव पुरस्कार’ माखनलाल जी को ‘हिम किरीटिनी’ पर दिया गया था। 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कार की स्थापना होने पर हिंदी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार दादा को ‘हिमतरंगिनी’ के लिए प्रदान किया गया। ‘पुष्प की अभिलाषा’ और ‘अमर राष्ट्र’ जैसी ओजस्वी रचनाओं के रचयिता इस महाकवि के कृतित्व को सागर विश्वविद्यालय ने 1959 में डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया। 1963 में भारत सरकार ने ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत किया जिसे उन्होने 10 सितंबर 1967 को राजभाषा हिंदी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में यह अलंकरण लौटा दिया।
माखनलाल के हृदय से “साहित्य के सागर की हिलोरें उनके लेखन के विशाल भंडार के रूप में पाठकों की मन में समाती गई और वे साहित्य के सिंहासन पर विराजमान हो गए यह दुनिया को तब पता चला जब मध्यप्रदेश सरकार उनके खंडवा स्थित घर आई और उन्हें हिन्दी साहित्य सम्मान से सम्मानित किया गया। भारतीय साहित्य के इतिहास में 16 दिसंबर 1965 स्मरणीय रहेगी जब खंडवा में माखनलाल चतुर्वेदी को साहित्य का सम्मान देने के लिए राजनीति उनकी चौखट पर मस्तक नवाते हुये अपनी पूरी सरकार के साथ आई और सरकार ने साहित्य के चरणों में प्रणाम निवेदित कर दादा माखनलाल को यह सम्मान दिया। खंडवा उस समय छोटा सा शहर था किन्तु साहित्य के सम्मान की खबर देश के सभी मूर्धन्य साहित्यकारो, पत्रकार को हुई और दुनियाभर के साहित्यकार व पत्रकारों का रेला खंडवा की ओर कूच कर गया जिससे यहा के नागरिकों की हिन्दी के वयोवृद्ध साहित्यकार प० माखनलाल जी चतुर्वेदी के प्रति अपनी स्नेह-श्रद्धाजलि अर्पित करने की ललक ने खंडवा की यातायात व्यवस्था सहित सारी व्यवस्थाए चौपट कर दी। दादा को मिलने वाले इसी प्रेम और अपनत्व के कारण चतुर्वेदी जी साहित्य मे ‘भारतीय आत्मा’ के नाम से और साहित्य मे दादा के नाम से प्रख्यात रहे है।
दादा का यह सम्मान विलम्ब से हुआ और इतने विलम्ब से हुआ कि उन्हें मंच तक ले जाने के लिए एम्बुलेस कार की जरूरत पडी, लेकिन विलम्ब से हुआ यह बात मायने नहीं रखती , जो महत्वपूर्ण बात थी सबसे बड़ी ओर अनौखी थी वह थी कि राज्य शासन के द्वारा किसी साहित्यिक के सम्मान समारोह का भारत मे यह पहला अवसर था ओर वह भी साहित्यकार के घर जाकर किया गया था। इस सम्मान के बाबत श्रीकांत जोशी जी लिखते है कि दादा माखनलाल जी किसी के घर नहीं जाते थे लेकिन जैसे है उनके सम्मान की चर्चा चली, तो जिले के प्रमुख चिकित्सक को यह चिन्ता हुई कि जिस व्यक्ति ने वर्षों से अपने कमरे की देहलीज नही लाघी, वह अपने घर से चार फर्लांग दूर पुलिस ग्राउण्ड पर आयोजित सम्मान-समारोह मे कैसे उपस्थित होगा ? उन्होने पूरे एक सप्ताह तक प्रतिदिन उन्हें कुछ समय मोटर में बैठाकर पूर्वाभ्यास कराया, जिससे उस दिन असुविधा न हो। वह युग बड़ा ही विचित्र था जब लोग साहित्य के देवता दादा माखनलाल को बहुत दिनो तक उनकी मनुहारी मुसकान के मुगालते में रहे पर वे दर्द को पीकर भी अपनी पीड़ा प्रकट नहीं कर सके। अगर साहित्य के देवता कि बात खुद माखनलाल चतुर्वेदी के शब्दों में कि जाये तो उनकी इस कृति में उन्होने लिखा है कि –मेरी इस बोली का परिचय में कौन सी भूमिका लिखकर दूँ ,मेरा अब तक किया गया सारा प्रयत्न एक भूमिका है।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार० चीफ एडिटर हिन्दसंतरी डाटकाम
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल 9993376616
