दिग्विजय सिंह ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया कि TET की अनिवार्यता को भूतलक्षी यानी पिछली तारीख से लागू करना न्यायसंगत नहीं है उन्होंने सुझाव दिया कि इसे भविष्यलक्षी प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए ताकि पहले से कार्यरत शिक्षकों पर अचानक कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े उनका कहना है कि जिन शिक्षकों ने वर्षों पहले नियुक्ति पाई है और लंबे समय से सेवा दे रहे हैं उनके लिए नए नियमों को अचानक लागू करना असमानता पैदा करता है
इस फैसले के बाद राज्यभर में दो लाख से अधिक शिक्षकों के बीच चिंता का माहौल बन गया है खासतौर पर वे शिक्षक जो वर्ष 2009 से पहले नियुक्त हुए थे और जिनकी सेवा अवधि में अभी पांच साल से अधिक का समय शेष है उन्हें अब TET परीक्षा देना अनिवार्य किया गया है ऐसे में कई शिक्षकों को अपनी नौकरी और भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है
दिग्विजय सिंह ने सरकार से यह भी मांग की है कि इस पूरे मामले में रिव्यू या क्यूरेटिव पिटीशन दायर करने पर विचार किया जाए ताकि न्यायिक स्तर पर भी इस मुद्दे का समाधान निकल सके उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अंतिम निर्णय आने तक TET की अनिवार्यता को स्थगित रखा जाए ताकि शिक्षकों को मानसिक और पेशेवर दबाव से राहत मिल सके
इस मुद्दे ने शिक्षा व्यवस्था के भीतर कई सवाल खड़े कर दिए हैं एक तरफ सरकार गुणवत्ता और मानकों को बेहतर बनाने की दिशा में कदम उठा रही है वहीं दूसरी ओर लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नीति को लागू करते समय संतुलन और व्यावहारिकता बेहद जरूरी होती है ताकि सुधार के प्रयासों का असर नकारात्मक न पड़े
फिलहाल सभी की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस मांग पर किस तरह प्रतिक्रिया देती है और क्या शिक्षकों को किसी तरह की राहत मिलती है या नहीं यह मुद्दा आने वाले समय में और ज्यादा चर्चा का विषय बन सकता है क्योंकि इससे सीधे तौर पर शिक्षा व्यवस्था और लाखों परिवारों का भविष्य जुड़ा हुआ है
