काशी के घाट केवल पत्थरों की सीढ़ियाँ नहीं हैं, वे समय के श्वास–प्रश्वास हैं। उन्हीं श्वासों के बीच ललिता घाट खड़ा है—जहाँ गंगा की धारा इतिहास भी है और साधना भी। यह घाट काशी विश्वनाथ मंदिर के सान्निध्य में ऐसा विराम है, जहाँ देह स्नान करती है और मन उतरता है।
ललिता घाट का नाम शाक्त परंपरा की उस ऊर्जा से जुड़ा है जहाँ ललिता केवल एक नाम नहीं, चेतना की कोमल परंतु प्रखर अभिव्यक्ति है। यहीं से गंगा-स्नान के बाद भक्त बाबा विश्वनाथ की ओर बढ़ते हैं—आज के समय में सुव्यवस्थित कॉरिडोर से—पर भीतर का मार्ग वही पुराना है: धैर्य, विनय और प्रतीक्षा।
गंगा में डुबकी लगाते ही लगता है कि जल नहीं, स्मृति छू रही है। स्मृति—कि काशी में कुछ भी तात्कालिक नहीं; यहाँ हर कदम अनादि से जुड़ा है। गंगा आरती की लौ जब अंधेरे को चूमती है, तब समझ आता है कि प्रकाश बाहर नहीं, भीतर उतरता है।
आज बताया गया कि बाबा की पूजा-अर्चना हेतु योगी आदित्यनाथ पधारे हैं। इसलिए कतारें लंबी हैं—लंबी इतनी कि समय भी थक जाए। पर काशी में थकान भी तप बन जाती है। घंटों खड़े रहना आसान नहीं, पर यहाँ कठिनाई ही करुणा सिखाती है। कतार में खड़ा भक्त जब हरिनाम संकीर्तन में लय पाता है, तब प्रतीक्षा भक्ति में बदल जाती है। समझ आता है कि दर्शन केवल नेत्रों का नहीं—चित्त का संस्कार है।
बाबा की नगरी में सुलभता भी एक साधना है। हर कोई चाहता है कि दर्शन जल्दी हो जाएँ, पर काशी सिखाती है—जल्दी नहीं, गहराई चाहिए। कीर्तन के साथ खड़ी कतार मानो कहती है: “जब तक नाम है, तब तक मंज़िल पास है।” यही वह अलौकिक आनंद है, जहाँ दर्शन मिलना नहीं—हो जाना है।
ललिता घाट से उठकर बाबा की ओर बढ़ते कदमों में जब अहंकार घुलता है, तब मंदिर की देहरी पर पहुँचते-पहुँचते मन स्वयं को उतार देता है। काशी यही करती है—देह को क्रम में, मन को क्रमातीत। और तब, एक क्षण में, बाबा मिलते हैं—भीड़ के पार, समय के पार।
ऐसी ही एक कतार में हम भी थे…
जहाँ प्रतीक्षा ने प्रार्थना बनना सीखा,
और दर्शन—अनुग्रह।
दासानुदास चेदीराज दास
