जानकारी के अनुसार शीतल झिरी परियोजना के लिए 23 मार्च 2026 को भूमि अर्जन की प्रारंभिक अधिसूचना जारी की गई थी। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें इस प्रक्रिया में पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और न ही उनका पक्ष सुना गया। इस अधिसूचना के बाद से स्थानीय लोग चिंतित हैं और उन्हें डर है कि उनकी पारंपरिक जमीनें और कृषि योग्य भूमि नुकसान में आ सकती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना का लाभ केवल कुछ बड़े हितधारकों को मिलेगा और आम ग्रामीण तथा जनजातीय समुदाय इसके दुष्प्रभाव झेलेंगे।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि शीतल झिरी परियोजना के तहत प्रस्तावित बांध और जलाशय से उनके खेत और घर प्रभावित हो सकते हैं। इस कारण से उन्होंने विरोध स्वरूप कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया तत्काल रोकी जाए और इस परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र अध्ययन कराया जाए।
सेहरा ग्रामीण संघर्ष मोर्चा के प्रतिनिधियों ने बताया कि वे लंबे समय से परियोजना के प्रभावों को लेकर सरकार और प्रशासन के संपर्क में हैं लेकिन उनकी चिंताओं को अनसुना किया गया। इस परियोजना से प्रभावित क्षेत्रों में लोगों का जीवन खेती और स्थानीय पारिस्थितिकी प्रणाली सीधे प्रभावित होगी। ग्रामीणों का कहना है कि पेसा एक्ट के तहत उनकी स्वीकृति और पारंपरिक अधिकारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
ज्ञापन सौंपने के बाद ग्रामीणों ने जोर देकर कहा कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगों को उठाएंगे। यदि प्रशासन ने उनकी बात नहीं सुनी और अधिग्रहण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने को तैयार हैं।
कलेक्टर कार्यालय ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा कि ज्ञापन प्राप्त हुआ है और इसे संबंधित विभागों के पास भेजकर जांच करवाई जाएगी। प्रशासन ने आश्वस्त किया कि ग्रामीणों की चिंता को ध्यान में रखते हुए परियोजना की अधिग्रहण प्रक्रिया की समीक्षा की जाएगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि शीतल झिरी परियोजना जैसे सिंचाई और जल प्रबंधन प्रयास ग्रामीणों और स्थानीय पारिस्थितिकी पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए परियोजना के क्रियान्वयन से पहले स्थानीय समुदायों की सहमति पर्यावरणीय अध्ययन और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।
बैतूल में यह विरोध प्रदर्शन न केवल भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पर सवाल उठाता है बल्कि यह यह भी दर्शाता है कि ग्रामीण और जनजातीय समुदाय अपनी पारंपरिक जमीनों और अधिकारों की सुरक्षा के लिए सतर्क और सजग हैं। प्रशासन और सरकार पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे पारदर्शी और संवेदनशील तरीके से इस तरह के विकास परियोजनाओं को लागू करें।
ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल अपनी भूमि और जीवन-यापन की सुरक्षा करना है और वे किसी भी प्रकार की हिंसा में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि स्थानीय लोगों की चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए और न्यायसंगत समाधान निकाला जाए।
