इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति Droupadi Murmu, उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar, लोकसभा अध्यक्ष Om Birla और प्रधानमंत्री Narendra Modi सहित कई शीर्ष नेताओं ने भाग लिया और संसद परिसर में पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इस दौरान विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति ने इस अवसर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया, जिससे सामाजिक सुधार के मूल्यों पर व्यापक सहमति का संदेश सामने आया।
नेताओं ने अपने संबोधन में महात्मा फुले के उस ऐतिहासिक संघर्ष को याद किया जिसमें उन्होंने समाज में व्याप्त असमानता, छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई थी। विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को रेखांकित किया गया, जहां उन्होंने वंचित वर्गों और महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार खोलने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके प्रयासों ने उस समय की सामाजिक संरचना को चुनौती दी और एक नए युग की शुरुआत की।
इस अवसर पर यह भी कहा गया कि महात्मा फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर महिला शिक्षा की मजबूत नींव रखी, जो भारतीय समाज सुधार आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है। उनके प्रयासों के कारण समाज के उन वर्गों तक शिक्षा पहुंची जो लंबे समय तक इससे वंचित रहे थे।
कार्यक्रम में यह विचार भी सामने आया कि आधुनिक भारत में भी फुले के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। सामाजिक समानता, शिक्षा का अधिकार और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे आज भी विकास और न्यायपूर्ण समाज की बुनियाद बने हुए हैं। नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि उनके आदर्शों को केवल स्मरण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें नीतियों और व्यवहार में वास्तविक रूप से लागू करना आवश्यक है।
इस श्रद्धांजलि समारोह ने यह संदेश दिया कि सामाजिक न्याय और समानता के मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है और फुले के विचार इस दिशा में आज भी मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं। उनके जीवन को एक प्रेरणास्रोत के रूप में देखते हुए यह भी कहा गया कि उनका संघर्ष केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी दिशा प्रदान करता है।
