सूर्य के राशि परिवर्तन से जुड़ा है पर्व
यह पर्व मेष संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है, जब सूर्य देव मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इस दिन गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान और सूर्य की उपासना का विशेष महत्व होता है। इसी के साथ खरमास का समापन भी हो जाता है और विवाह, उपनयन जैसे शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।
सत्तू और घड़े के दान का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सत्तू का दान करने से देवी-देवता प्रसन्न होते हैं, जबकि जल से भरा घड़ा दान करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है। बेल, तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा और कच्चा आम जैसे ठंडक देने वाले फल भी दान किए जाते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि को पराजित करने के बाद सबसे पहले सत्तू का सेवन किया था, तभी से इस दिन सत्तू का विशेष महत्व माना जाता है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार जिनकी कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है, वे इस दिन जल से भरा घड़ा दान करें तो उन्हें लाभ मिलता है।
आस्था के साथ सेहत का भी ख्याल
सतुआ संक्रांति सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। गर्मी के मौसम में सत्तू शरीर को ठंडक देने का काम करता है। सत्तू का शरबत पीने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है और लू से बचाव होता है। यह फाइबर, प्रोटीन और मिनरल्स से भरपूर होता है, जिससे पाचन तंत्र मजबूत होता है और पेट की गर्मी कम होती है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, घर से निकलने से पहले सत्तू का सेवन करने से हीट स्ट्रोक का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
परंपरा और विज्ञान का अनोखा मेल
सतुआ संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में परंपरा और विज्ञान का सुंदर उदाहरण है। जहां एक ओर दान-पुण्य से आत्मिक संतोष मिलता है, वहीं सत्तू जैसे पौष्टिक आहार से शरीर को भी राहत मिलती है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी लोगों की आस्था और जीवनशैली का अहम हिस्सा बना हुआ है।
