तरुण खन्ना के अनुसार इस किरदार को बार बार निभाने से उनके स्वभाव में बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति रहती थी, वहीं अब उनके भीतर धैर्य और संतुलन की भावना काफी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि इस भूमिका ने उनके अंदर कहीं दबी हुई विनम्रता को फिर से जीवित कर दिया है, जो समय और अनुभव के साथ कहीं पीछे छूट गई थी।
उन्होंने यह भी बताया कि हर बार मंच पर या स्क्रीन पर इस किरदार को निभाना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है क्योंकि यह केवल अभिनय नहीं बल्कि भावनाओं और आस्था से जुड़ा विषय है। यही कारण है कि हर प्रस्तुति से पहले उन्हें हल्की घबराहट महसूस होती है, ताकि किरदार की गरिमा और प्रभाव में किसी तरह की कमी न रह जाए।
तरुण खन्ना ने कहा कि इस अनुभव ने उन्हें यह समझाया है कि अभिनय केवल संवाद बोलने का नाम नहीं है, बल्कि उसमें भावनाओं की गहराई और जिम्मेदारी भी शामिल होती है। उन्होंने बताया कि मंच पर लाइव परफॉर्मेंस की चुनौती अलग होती है, जहां एक ही मौके में पूरी ऊर्जा के साथ प्रदर्शन करना पड़ता है, जबकि टेलीविजन पर बार बार रीटेक का अवसर मिलता है।
उनका कहना है कि थिएटर का अनुभव उनके लिए अधिक संतोषजनक है क्योंकि वहां दर्शकों की प्रतिक्रिया तुरंत मिलती है और कलाकार को अपने प्रदर्शन की वास्तविक अनुभूति होती है। इसी वजह से वे मंचीय प्रस्तुति को अधिक चुनौतीपूर्ण और प्रभावशाली मानते हैं।
तरुण खन्ना ने यह भी कहा कि कलाकारों की सार्वजनिक छवि बहुत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि दर्शक उन्हें उनके किरदारों के साथ साथ वास्तविक जीवन में भी देखते हैं। ऐसे में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि उनका व्यवहार और सोच समाज पर सकारात्मक प्रभाव छोड़े।
उनके अनुसार महादेव का किरदार उनके जीवन का हिस्सा बन चुका है, जिसने उन्हें न केवल एक बेहतर अभिनेता बनाया बल्कि एक अधिक शांत और संतुलित इंसान भी बनाया है।
