कभी इस क्षेत्र की पवित्रता को बनाए रखने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट घोषणा की थी कि नर्मदा तट से पांच किलोमीटर के दायरे में शराब की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी। इस फैसले का उद्देश्य था कि आस्था और धार्मिक मर्यादाओं की रक्षा हो सके और नर्मदा किनारे का वातावरण स्वच्छ और पवित्र बना रहे। लेकिन आज यह घोषणा सिर्फ कागजों तक सीमित नजर आती है।
जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। नगर के पान ठेले छोटे दुकानों होटल और ढाबों पर खुलेआम शराब बेची जा रही है। न केवल बिक्री बल्कि लोगों को बैठाकर वहीं शराब पिलाई जा रही है। यह सब इतनी बेखौफी से हो रहा है जैसे नियम कानून का कोई अस्तित्व ही न हो।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन को यह सब दिखाई नहीं दे रहा या फिर जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अवैध कारोबार लंबे समय से चल रहा है और कार्रवाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकताएं ही की जाती हैं। कभी कभार छापेमारी होती है कुछ बोतलें जब्त होती हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा शुरू हो जाता है।
यह मामला सिर्फ कानून के उल्लंघन तक सीमित नहीं है बल्कि आस्था के साथ भी सीधा खिलवाड़ है। मंडला की पहचान ही नर्मदा तट की पवित्रता से जुड़ी हुई है। लोग यहां दूर दूर से आते हैं मोक्ष और शांति की कामना लेकर लेकिन जब इसी पवित्र स्थान पर शराब का कारोबार खुलेआम हो तो यह श्रद्धा को ठेस पहुंचाने वाला है।
स्थिति यह दर्शाती है कि कहीं न कहीं सिस्टम कमजोर पड़ रहा है या फिर अवैध कारोबार करने वालों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि उन्हें किसी का डर नहीं रह गया है। यह भी सवाल उठता है कि जिम्मेदारी किसकी है प्रशासन की स्थानीय पुलिस की या फिर समाज की जो सब कुछ देखकर भी चुप है।
आज जरूरत सिर्फ खबर दिखाने की नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई की है। उन वादों को जमीन पर उतारने की है जो कभी जनता से किए गए थे। अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं की गई तो वह दिन दूर नहीं जब आस्था की यह नगरी अपनी पहचान खोने लगेगी।
यह मामला केवल एक अवैध कारोबार का नहीं बल्कि आस्था कानून और व्यवस्था तीनों की परीक्षा है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार तंत्र इस चुनौती का सामना कैसे करता है और क्या नर्मदा तट की पवित्रता को फिर से स्थापित किया जा सकेगा या नहीं।
