आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
पृथ्वी पर मनुष्य के जन्म का प्राचीनतम कोई निश्चित समय लिपिवद्ध नहीं है तथा मानव वैज्ञानिक हजारों वर्षों के दायरे में मानव प्रवृत्तियों की खोज करते आ रहा है जो आज भी अधूरी है। आदिमानव की उत्पत्ति, उत्कर्ष ओर वर्तमान समय का अध्ययन दिलचस्प है जिसमें नर को वानर से जोड़ा गया, ओर वानर से नर के विकास की बात को कुछेक ने स्वीकारोक्ति दी तो कुछ सनातनी परंपरा में इसे किवदंती मानते है। आदि मानव का जन्म रहस्यमय है, उनके जन्म मृत्यु की पृथक सभ्यता विकसित हुई जिसने वैचारिक रूप में घर, समाज ओर परिवार को जन्म दिया। अकेला भारत देश था जो आदिमानव की आरंभिक सृष्टि में ज्ञान की उच्च शिखर पर रहकर समाज में धर्म को प्रतिष्ठित कर चुका था इसलिए भारत भूमि को धर्मप्रधान कहा गया।
आदिकाल में जब संसार के लोग आदिमानव की उपाधि से बाहर निकलकर जीवन जीने का संघर्ष कर रहे थे, तब उन दिनो हमारे ऋषि मुनि वेदों को रचना कर धर्म के रूप में यज्ञ को अंगीकार कर उन्हे सम्पादन कर लौकिक तथा परलोकिक कामनायों की सिद्धियां प्राप्त कर व्यक्तिविशेष को अथवा समाज को इसका लाभ पहुंचा चुके थे। यहूदी, ईसाई जैसे कुछ धर्म विशेष आदिकाल की प्रारम्भिकता में आदिमानव के प्रथम पुरुष आदम ओर प्रथम नारी हब्बा की रोचक कहानियों से मनुष्यता के जन्म की शुरुआत बताते है ओर ईश्वर द्वारा स्वर्ग के बगीचे में मिट्टी से आदम का निर्माण होना मानते हुये उन्हे अच्छाई ओर बुराई के ज्ञान के वृक्ष को छोड़ शेष सभी फल खाने की स्वतन्त्रता थी ओर जैसे ही उन्होने निषिद्ध वृक्ष के फल खाये उन्हे स्वर्ग के बगीचे से निष्काषित कर दिया गया। जबकि भारत में यह बोध जो एक फल के खाये जाने पर स्वर्ग से निष्कासन झेलना पड़ा,बात थी ही नही। यहाँ सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा ने अपनी संतान ऋषियों को खुद आज्ञा देकर संतान पैदा करने को कहा, स्पष्ट है काम वासना के बिना संतान पैदा करना मुश्किल है। एक सेब का फल आदम ओर हव्वा को अपने शरीर का बोध कराकर प्रेमालिंगन को निमंत्रण दे तो इसमें गलत क्या था? काम वासना रूपी शक्ति को जनसंख्या वृद्धि में रूपांतरित करना संसार में प्रवेश करना है। दूसरे विकल्प के रूप में यही काम वासना की शक्ति को व्रत साधना, भक्ति आदि के मार्ग पर उपयोग करने से व्यक्ति खुद में परमात्मा को पाता है तो कोई यही शक्ति से अपने उपयोग उपभोग के लिए धन दौलत के अंबार खड़ा कर चुका होता है ।
भारत में आदिकालयुग आदिमानव के प्रसंग से रिक्त है अलबत्ता महाप्रलय का जिक्र है जहा सारी पृथ्वी जलमग्न हो गई तब मनु शतरूपा इस प्रलयकाल में सुरक्षित बच निकले जिन्होने संतति को बढ़ाया। एक आश्चर्यजनिक सत्य यह भी है कि उस समय सृष्टि के सृजन का उत्तरदायित्व ब्रम्हा के अधिकार में था तब ब्रम्हा जी ने जहा अपने शरीर से उत्पन्न मानस पुत्रों ओर ऋषि- मुनियों को अपने से पैदा होने के कारण ब्रम्हा की संतानों के रूप में पुराणों में उल्लेखित किया गया है। इन सभी ने विश्वसृष्टि ज्ञान को पुराणों के रूप में स्थापित किया जहां अनादि काल से ही इन ऋषि मुनियों ने भारत भूमि पर अपने-अपने इष्ट देवताओं की प्रसन्नता हेतु, राष्ट्रकल्याण हेतु, जनकल्याण हेतु एवं अन्य मानव समाज के उत्थान हेतु उनके कल्याणार्थ विविध प्रयोजनों की सिद्धि हेतु अनुष्ठान आदि सहित यज्ञों को सम्पादित करने की परम्परा प्रचलित की। यही कारण था की ऋषि मुनियों का यह ज्ञान संसार में सत्य प्रजापति के रूप में तीन भाग आत्मा, प्राण तथा पशु के रूप में प्रजापति पद पर आसीन हुआ जिससे यज्ञादि कार्य संपादित किए गए। स्पष्ट है जगत की सृष्टि के समय जिसे आदि मानव की संज्ञा दी गई वह एक विशेष धर्म में जीने की उत्सुकता लिए जल, वायु, अग्नि , भूमि आदि की उपयोगिता को समझने ओर इसके उपयोग ओर उपभोग के उपाय मे अपना समय व्यर्थ खोती गई जबकि हमारे यहां हमारे पूर्वज इन पंचभूतों के ज्ञान से पूर्ण थे ओर इनकी सृष्टि, सामाजिक उपादेयता व उनमें मौजूद सृजन ओर विनाश के सभी मूल तत्वों को जान चुके थे।
मनुष्यता के जन्म के समय दुनिया में साँसे ले रहे आदिमानव के जीवन में सामान्य से बदलाव आने शुरू हुये ओर वह जंगल पहाड़ के अपने डेरे को आने वाले मौसम के बदलाव के साथ आदिम सभ्यता की अपनी नीव को छोड़ आवास बनाकर रहने, जंगली जानवरों के शिकार से भूख शांत करने की धारणा से मुक्त हो खेती कर फसल के उपयोग ओर जानवरों को पालने की ओर बढ़ने लगे तब तक भारत में सनातन धर्म यहा मनुष्य समाज में वैचारिक रूप से परिपक्य हो धर्म को अपने जीवन का अभिन्न अंग बना चुका था। या यह कहे की तब यह धारणा सभी के मन में आ गई थी की हम सभी धर्म के साथ पैदा होते है, धर्म को जीते है ओर धर्मानुकरण को जीते हुये मृत्यु को प्राप्त होते है। स्पष्ट है भारत अपनी सनातन संस्कृति के प्रति सजग ओर जीवंत था ओर आदिमानव के पाशविक प्राणियों के तरह जी रहे जीवन का साक्षी भी रहा है तभी वह इस सभ्यता से बाहर निकल कर अपनी मानवीय संस्कृति को देवत्व तक प्रतिष्ठित कर सका ओर आदिमानव के दायरे से मुक्त हो मनुष्यत्व होना साकार कर सका।
मनुष्यत्व अर्थात मनुष्य का पैदा होना ठीक उसी प्रक्रिया का अंग है जिसमें अन्य प्राणी ओर पशुओं का जन्म प्राकृत व असंस्कृत होता है जिसमें मात्र मनुष्य है जो जन्म के बाद संस्कारों में संस्कारित हो संस्कृत बनता है। संस्कृति उसे मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कहलाने का वास्तविक अधिकारी बनाती है, ओर यह संस्कार ही धर्म है। सच कहा जाए तो मनुष्य के लिए संस्कार वह अनमोल पूंजी है जिसमें आदिमानव को मानव बनाया ओर मानव के दोषों को दूर कर उस में गुणों की त्रिवेणी का संचार किया। हर मनुष्य चाहता है की वह गुणों से सम्पन्न ओर संस्कारवान हो इसीलिए संस्कारों का प्रयोजन दोष उन्नयन व गुणाधान माना है। ऐसी स्थिति में कोई भी मनुष्य धर्म विमुख होने की इच्छा नहीं करता। फिर भी जनसमूह का प्रमुख अंग बना यह व्यक्ति बिखरता जा रहा है ओर उसका सारा दिखावा धर्ममय होते हुए भी वह धर्मविमुख बन जाता है , ऐसा क्यों?
यदि इन कारणों की गवेषणा की जाय तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि आजकल का मनुष्य समाज प्रत्येक वस्तु को विज्ञान व तर्क की कसौटी पर कस कर जानना चाहता है। यदि यह साधन या साध्य नहीं मिलता तो उसकी उस वस्तु पर अश्रद्धा व अरुचि पैदा हो जाती है जो उसे धर्मविमुख बनाती है। यह भी सच है की अगर मनुष्य के जीवन से धर्म को निकल दिया जाये तो वह खुद को अधूरा ओर संकटापन्न देखता है ओर उसमे मनुष्यता का अभाव दिखेगा, यानि उसे लगेगा की वह मनुष्य के धर्म से गिर गया है। जबकि आदम ओर हब्बा को सिर आंखो पर रखने वाले दुनियाभर के लोग सनातन संस्कृति का तोड़ नही ढूंढ पाते है तब उन्होने भी भारतीय धर्म कि उद्धघोषणा के बाद अपना तर्क रखा कि हाब्बा ने कठोर तप-साधना से मनुष्य देह के रहस्यों सहित प्राण विज्ञान की खोज की है। अन्ततोगत्वा वे इसके रहस्यों को जान गये और उस प्रयास के समस्त अनुभव एवं प्राप्ति के सभी उपाय उन्होंने वेद, पुराण, उपनिषद ओर शास्त्रों में लिख भी दिया है आवश्यकता है इसमें छिपे आनंद ओर प्राप्त होने वाली शांति की ताकि मानव लौकिक तथा पारलौकिक कामनाओं की पूर्ति के साधनरूप धर्म को धारण करे।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्री जगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्य प्रदेश मोबाइल 9993376616
