नई दिल्ली । वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। इस व्रत का संबंध माता सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जिसमें सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति के प्राण वापस ले लिए थे। इसी कारण यह व्रत वैवाहिक जीवन की मजबूती और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
साल 2026 में वट सावित्री व्रत 16 मई, शनिवार को मनाया जाएगा। यह तिथि ज्येष्ठ माह की अमावस्या को पड़ रही है। अमावस्या तिथि का आरंभ सुबह 5 बजकर 11 मिनट पर होगा और यह देर रात 1 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर व्रत 16 मई को ही रखा जाएगा।
जो महिलाएं पहली बार व्रत रखने जा रही हैं, उनके लिए नियमों का पालन बेहद जरूरी है। इस दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर वट वृक्ष की पूजा की जाती है। महिलाएं वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं और कच्चा सूत बांधकर पूजा करती हैं। सावित्री-सत्यवान की कथा सुनना इस व्रत का प्रमुख हिस्सा है। इसके बाद पति की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना की जाती है।
पूजा के लिए इस दिन शुभ मुहूर्त सुबह 7 बजकर 12 मिनट से 8 बजकर 24 मिनट तक रहेगा, जो अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस वर्ष वट सावित्री व्रत पर सौभाग्य योग और शोभन योग का संयोग भी बन रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है।
वट सावित्री व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह पति-पत्नी के अटूट प्रेम और समर्पण को भी दर्शाता है। पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए यह आवश्यक है कि वे पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूजा करें ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
