राग शिवरंजनी की बनावट ही कुछ ऐसी है कि इसमें इस्तेमाल होने वाले सुर सीधे मानवीय संवेदनाओं से जुड़ते हैं। शास्त्रीय संगीत की दृष्टि से देखें तो इसमें केवल पांच सुरों— सा, रे, ग, प, ध— का प्रयोग होता है, जिसमें म और नी पूरी तरह वर्जित होते हैं। इस राग की सबसे बड़ी खासियत इसके कोमल ‘ग’ और कोमल ‘ध’ सुर हैं, जो सुनने वाले के भीतर एक मीठा विरह और करुण रस पैदा करते हैं। इस राग को गाने का सबसे उत्तम समय रात्रि का दूसरा पहर माना जाता है, जब चारों ओर सन्नाटा होता है और मन आध्यात्मिक शांति की तलाश में होता है। फिल्म संगीतकारों ने इस राग का उपयोग वहां किया है जहाँ उन्हें प्रेम की तड़प, जुदाई का गम या रूहानी सुकून दिखाना होता था।
अगर हम बॉलीवुड के 7 सबसे यादगार गानों की बात करें, तो आरडी बर्मन द्वारा संगीतबद्ध ‘मेरे नैना सावन भादों’ इस राग का सबसे सटीक उदाहरण है। किशोर कुमार की आवाज में जो तड़प महसूस होती है, वह इसी राग की देन है। इसी तरह राज कपूर पर फिल्माया गया ‘जाने कहां गए वो दिन’ आज भी पुराने दिनों की यादों को ताज़ा कर आंखों को नम कर देता है। शंकर-जयकिशन ने इस राग का बखूबी इस्तेमाल ‘आवाज देके हमें तुम बुलाओ’ और ‘दिल के झरोखे में तुझको बैठाकर’ जैसे गानों में किया, जहाँ विरह और प्रेम का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। यहाँ तक कि ‘बहारों फूल बरसाओ’ जैसा खुशी का गाना भी इसी राग पर आधारित है, लेकिन इसमें भी एक अनकही गहराई छिपी हुई है।
दिलचस्प बात यह है कि राग शिवरंजनी केवल दुख ही नहीं, बल्कि एक छिपा हुआ दर्द और भक्ति का भाव भी समेटे रहता है। लक्ष्मीकांत-प्यारे लाल का ‘तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अंजाना’ या हेमंत कुमार का ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’, ये सभी गाने सुनने वाले को एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं। संगीत के जानकारों का मानना है कि इन रागों का हमारे मूड पर सीधा असर होता है। यही वजह है कि जब हम किसी मानसिक तनाव या ब्रेकअप से गुजर रहे होते हैं, तो इन गानों को सुनने से हमें एक भावनात्मक सहारा मिलता है। आज के शोर-शराबे वाले संगीत के बीच, ये रागों पर आधारित मेलोडी हमें यह याद दिलाती हैं कि संगीत का असली मकसद कानों को नहीं, बल्कि आत्मा को छूना है। इन सात गानों को फिर से सुनना हमें उस सुनहरे दौर की याद दिलाता है जहाँ हर एक धुन के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और भावनात्मक आधार होता था।
