पाकर सब, कुछ ना मिले, होकर जिम्मेवार।
कितना धोखेबाज़ है, ‘सौरभ’ ये किरदार।।
जिनको अपना मानकर, सौंपा था सम्मान,
वही पीठ में घोंपते, मतलब वाले बाण।
चेहरों पर मुस्कान है, भीतर तेज़ कटार—
कितना धोखेबाज़ है, ‘सौरभ’ ये किरदार।।
रिश्तों की चौपाल में, बिकता रोज़ जमीर,
मीठे शब्दों के तले, पलती गहरी पीर।
अपनों के ही हाथ अब, घोंप रहे तलवार—
कितना धोखेबाज़ है, ‘सौरभ’ ये किरदार।।
सुख में बनते देवता, दुःख में सब गुमनाम,
काम निकलते ही बदल, लेते अपना नाम।
जिंदा दिल को नोचते, गिद्धों का संसार—
कितना धोखेबाज़ है, ‘सौरभ’ ये किरदार।।
सौरभ अब मत ढूँढ तू, रिश्तों में भगवान,
स्वार्थों के इस दौर में, बिकता हर इंसान।
समुंदर जैसे दिल यहाँ, लुटते हैं हर बार—
कितना धोखेबाज़ है, ‘सौरभ’ ये किरदार।।
✍️ — डॉ. सत्यवान सौरभ
