गोर्बाचेव 1985 में सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। उस समय सोवियत संघ आर्थिक संकट, राजनीतिक जड़ता और अमेरिका के साथ तीव्र शीत युद्ध की स्थिति से गुजर रहा था। उन्होंने देश को सुधारने के लिए दो प्रमुख नीतियां लागू कीं पेरेस्त्रोइका (Perestroika) और ग्लासनोस्त (Glasnost)। पेरेस्त्रोइका का अर्थ था आर्थिक पुनर्गठन, जबकि ग्लासनोस्त का मतलब था राजनीतिक पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
इन्हीं सुधारों के कारण सोवियत समाज में बड़े बदलाव आने लगे। लोगों को पहले की तुलना में अधिक स्वतंत्रता मिली, मीडिया पर नियंत्रण कम हुआ और सरकार के भीतर पारदर्शिता बढ़ी। हालांकि इन सुधारों ने सोवियत संघ की पुरानी कठोर व्यवस्था को कमजोर भी किया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे शांति और सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना गया।
नोबेल शांति पुरस्कार समिति ने गोर्बाचेव को यह सम्मान “शीत युद्ध के अंत में उनकी निर्णायक भूमिका” के लिए दिया। विशेष रूप से 1980 के दशक के अंत में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ मिलकर परमाणु हथियारों की दौड़ को रोकने के लिए कई समझौते किए। इनमें INF Treaty (Intermediate-Range Nuclear Forces Treaty) जैसे ऐतिहासिक समझौते शामिल थे, जिनसे यूरोप में परमाणु हथियारों का खतरा काफी हद तक कम हुआ।
गोर्बाचेव को यह पुरस्कार मिलने का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने सोवियत सेना को पूर्वी यूरोप से पीछे हटने की अनुमति दी। इसके चलते पोलैंड, हंगरी, पूर्वी जर्मनी और अन्य देशों में लोकतांत्रिक आंदोलन तेज हुए और अंततः बर्लिन की दीवार गिर गई, जो शीत युद्ध के अंत का प्रतीक बन गई।
हालांकि कुछ आलोचकों का मानना है कि गोर्बाचेव की नीतियों ने सोवियत संघ को कमजोर किया, जिसके कारण 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय का एक बड़ा हिस्सा उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखता है जिसने युद्ध के बजाय बातचीत और सहयोग का रास्ता चुना।
1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद गोर्बाचेव की भूमिका और भी ऐतिहासिक मानी जाने लगी। वे न केवल एक राजनीतिक नेता रहे, बल्कि वैश्विक शांति, निरस्त्रीकरण और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतीक बन गए। उन्होंने बाद के वर्षों में भी पर्यावरण, मानवाधिकार और वैश्विक सहयोग के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाई।
उनकी पहचान सिर्फ एक राष्ट्र के नेता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे पूरी दुनिया में “शांति निर्माता” (Peacemaker) के रूप में जाने जाने लगे। उनके प्रयासों ने यह साबित किया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो सबसे बड़े शत्रु भी संवाद के जरिए शांति की ओर बढ़ सकते हैं।
गोर्बाचेव की विरासत आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का विषय है। उनके कार्यों ने यह संदेश दिया कि हथियारों की दौड़ और टकराव से बेहतर संवाद और सहयोग का रास्ता होता है। यही कारण है कि नोबेल शांति पुरस्कार उन्हें केवल एक सम्मान नहीं बल्कि वैश्विक इतिहास में उनके योगदान की औपचारिक मान्यता माना जाता है।
