यह परियोजना मध्य प्रदेश सरकार और स्वामी विवेकानंद फाउंडेशन के बीच हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत विकसित की जा रही है। हालांकि, शुरुआत से ही इस योजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और आपत्तियां सामने आती रही हैं।
लगातार विरोध के चलते टला भूमिपूजन
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को निजी हाथों में नहीं दिया जाना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर जिले में लंबे समय से असंतोष बना हुआ है। विरोध के कारण इस परियोजना का भूमिपूजन दो बार टालना पड़ा। पहले मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का कार्यक्रम प्रस्तावित था, लेकिन विरोध की आशंका के चलते उसे स्थगित कर दिया गया। इसके बाद केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा का कार्यक्रम भी रद्द कर दिया गया। स्थिति को देखते हुए अब प्रशासन ने बिना किसी वीआईपी आयोजन के सीधे निर्माण कार्य शुरू कराने का निर्णय लिया है।
सरकार का तर्क: स्वास्थ्य ढांचे को मिलेगा मजबूत आधार
सरकारी पक्ष का मानना है कि यह मेडिकल कॉलेज क्षेत्र में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करेगा। इससे स्थानीय युवाओं को मेडिकल शिक्षा के बेहतर अवसर अपने ही जिले में मिल सकेंगे। पीपीपी मॉडल को लेकर सरकार का दावा है कि इससे परियोजना तेजी से पूरी होगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।
जनता की चिंता: निजीकरण पर उठे सवाल
हालांकि दूसरी ओर स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों में इस मॉडल को लेकर गहरी नाराजगी है। उनका आरोप है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं को निजी प्रबंधन के हवाले करने से आम जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ सकता है। लोगों का कहना है कि इलाज और मेडिकल शिक्षा महंगी हो सकती है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए पहुंच कठिन हो जाएगी।
“शासकीय मेडिकल कॉलेज नहीं तो वोट नहीं” का नारा
स्थानीय समाजसेवी विंधेश्वरी पटेल ने कड़े शब्दों में विरोध जताते हुए कहा कि वे लंबे समय से पूर्णतः शासकीय मेडिकल कॉलेज की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पीपीपी मॉडल का वे विरोध नहीं कर रहे, लेकिन शासकीय नियंत्रण जरूरी है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि आने वाले समय में बड़ा जन आंदोलन चलाया जाएगा और इसका नारा होगा- “कटनी को शासकीय मेडिकल कॉलेज नहीं तो भाजपा को वोट नहीं।”
आगे की राह पर नजर
फिलहाल परियोजना का निर्माण कार्य प्रारंभ हो चुका है, जिसमें पहले चरण में बाउंड्री वॉल का निर्माण और भूमि की सुरक्षा शामिल है। प्रशासन का कहना है कि यह एक दीर्घकालिक विकास परियोजना है, जबकि विरोधी इसे निजीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बता रहे हैं। अब देखना यह होगा कि यह विवाद आगे राजनीतिक रूप लेता है या सरकार और जनता के बीच कोई बीच का रास्ता निकल पाता है।
