बेंगलुरु ग्रामीण जिले के देवनहल्ली में मीडिया से बातचीत के दौरान केएच मुनियप्पा ने स्पष्ट किया कि वह मौजूदा परिस्थितियों में उन्हें सौंपे गए विभाग का प्रभार ग्रहण नहीं करेंगे। उनका कहना है कि विभागों का आवंटन करते समय वरिष्ठ नेताओं के अनुभव, राजनीतिक योगदान और संगठन में उनकी भूमिका का पर्याप्त सम्मान नहीं किया गया। उन्होंने संकेत दिया कि जब तक पार्टी नेतृत्व इस मामले की समीक्षा कर कोई संतोषजनक निर्णय नहीं लेता, तब तक वह मंत्रालय का कार्यभार नहीं संभालेंगे।
पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा ने कहा कि लंबे राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव वाले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपते समय वरिष्ठता को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी केवल सरकार चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर संतुलन और विश्वास बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनके अनुसार ऐसे फैसले होने चाहिए जो संगठनात्मक एकता को मजबूत करें और कार्यकर्ताओं में सकारात्मक संदेश पहुंचाएं।
मुनियप्पा ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से सीधे हस्तक्षेप की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि पार्टी अध्यक्ष को एक अभिभावक की भूमिका निभाते हुए सभी वरिष्ठ नेताओं की भावनाओं को समझना चाहिए और ऐसा समाधान निकालना चाहिए जिससे किसी भी स्तर पर असंतोष की स्थिति न बने। उन्होंने बताया कि अपनी नाराजगी से वह राहुल गांधी, रणदीप सिंह सुरजेवाला, केसी वेणुगोपाल, सिद्धारमैया और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित शीर्ष नेतृत्व को अवगत करा चुके हैं।
हालांकि मुनियप्पा ने किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार नहीं ठहराया, लेकिन उनके बयान ने कांग्रेस सरकार के भीतर चल रही असहजता को उजागर कर दिया है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कुछ वरिष्ठ नेता इस बात से असंतुष्ट हैं कि कई प्रभावशाली विभाग अपेक्षाकृत युवा नेताओं या राजनीतिक रूप से प्रभावशाली परिवारों से जुड़े नेताओं को दिए गए हैं, जबकि लंबे समय से संगठन में योगदान देने वाले कुछ वरिष्ठ नेताओं को उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप जिम्मेदारियां नहीं मिलीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल विभागों के बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार और संगठन के भीतर शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। नई सरकार के गठन के बाद यदि वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी लगातार बढ़ती है तो इसका असर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और राजनीतिक संदेश दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे समय में कांग्रेस नेतृत्व के लिए सभी पक्षों को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मुनियप्पा की नाराजगी को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि वह कर्नाटक कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में शामिल हैं। सात बार सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके मुनियप्पा का राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है। रामलिंगा रेड्डी के बाद उनका विरोध यह संकेत देता है कि विभागों के बंटवारे को लेकर असंतोष व्यापक रूप ले सकता है। अब कांग्रेस हाईकमान और मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार के भीतर एकजुटता बनाए रखने और नाराज नेताओं को संतुष्ट करने की होगी।
