इस ड्राफ्ट का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में तकनीक के उपयोग को संतुलित और नियंत्रित ढंग से लागू करना है, ताकि आधुनिक तकनीक का लाभ भी मिले और न्यायिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता तथा मानवीय निर्णय की प्रधानता भी बनी रहे। प्रस्तावित ढांचे में यह स्पष्ट किया गया है कि AI सिस्टम केवल सहायक उपकरण के रूप में काम करेंगे और किसी भी स्थिति में न्यायाधीशों का स्थान नहीं लेंगे।
ड्राफ्ट में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल न्यायाधीशों के पास रहेगा। AI को किसी भी तरह से सजा सुनाने, कानूनी निष्कर्ष निकालने या मानवीय विवेक की जगह निर्णय देने की अनुमति नहीं होगी। इसका उपयोग केवल सहायता, विश्लेषण और प्रक्रियागत दक्षता बढ़ाने तक सीमित रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समिति, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा कर रहे हैं, में जस्टिस संजीव सचदेवा, जस्टिस राजा विजयराघवन वी., जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सूरज गोविंदराज शामिल हैं। इस समिति ने विस्तृत विचार-विमर्श के बाद यह ड्राफ्ट तैयार किया है और अब इसे अंतिम रूप देने से पहले व्यापक जनसुझाव की प्रक्रिया शुरू की गई है।
ड्राफ्ट में यह भी कहा गया है कि न्यायिक प्रणाली में उपयोग होने वाले सभी AI सिस्टम को इस प्रकार डिजाइन और लागू किया जाएगा कि वे निष्पक्षता को बढ़ावा दें और किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकें। इसमें नस्ल, धर्म, जाति, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति या किसी भी संवैधानिक रूप से प्रतिबंधित आधार पर भेदभाव को रोकने पर विशेष जोर दिया गया है।
साथ ही, महिलाओं, बच्चों, दिव्यांग व्यक्तियों, अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यह सुनिश्चित करने की बात कही गई है कि AI आधारित किसी भी प्रणाली से इन समूहों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
प्रस्तावित ढांचे में डेटा सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही को भी प्रमुख स्तंभों के रूप में शामिल किया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि न्यायिक AI सिस्टम को उच्चतम सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा ताकि संवेदनशील न्यायिक डेटा सुरक्षित रह सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारतीय न्याय प्रणाली में तकनीक के उपयोग को एक नए स्तर पर ले जा सकती है। हालांकि इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक का उपयोग मानव न्यायिक विवेक को प्रभावित न करे और न्याय की मूल भावना सुरक्षित रहे।
आने वाले दिनों में प्राप्त सुझावों के आधार पर ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा और फिर इसे न्यायालयों में AI के नियंत्रित उपयोग के लिए लागू किया जा सकता है। यह कदम न्यायिक प्रणाली में तकनीकी सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा रहा है।
