डॉ. शैलेश शुक्ला
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज केवल एक नई तकनीक नहीं रह गई है, बल्कि शिक्षा, रोजगार, शोध, व्यापार, पत्रकारिता, स्वास्थ्य, प्रशासन और संचार को बदलने वाली महत्वपूर्ण तकनीक बनती जा रही है। जिस प्रकार इंटरनेट ने सूचना तक पहुँच को व्यापक बनाया, उसी प्रकार एआई आने वाले वर्षों में ज्ञान, कौशल और उत्पादकता तक पहुँच का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनने वाला है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर प्रश्न भी सामने है कि क्या दुनिया के सभी देशों और सभी आय-वर्गों के लोगों को एआई का समान लाभ मिल सकेगा? यदि एआई की सदस्यता शुल्क ऐसी दरों पर तय होती है जो मुख्यतः अमेरिका और यूरोप जैसे उच्च आय वाले बाजारों की भुगतान क्षमता को ध्यान में रखती हैं, तो विकासशील देशों के करोड़ों लोगों के लिए वही कीमत बहुत महंगी साबित हो सकती है। मुद्रा के स्तर पर समान कीमत का अर्थ आर्थिक रूप से समान बोझ नहीं होता। किसी विकसित देश में बीस डॉलर की मासिक सदस्यता किसी व्यक्ति की आय का बहुत छोटा हिस्सा हो सकती है, जबकि विकासशील देश के निम्न या मध्यम आय वाले व्यक्ति के लिए यही राशि उसके मासिक बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इसलिए एआई सेवाओं की वैश्विक कीमत निर्धारित करते समय केवल विदेशी मुद्रा की विनिमय दर को आधार बनाना पर्याप्त नहीं है; स्थानीय आय, क्रय-शक्ति, औसत वेतन, जीवन-यापन की लागत और डिजिटल सेवाओं पर होने वाले खर्च को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
विकासशील देशों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को समझने के लिए प्रति व्यक्ति आय के साथ क्रय-शक्ति समता को देखना भी जरूरी है। किसी देश की प्रति व्यक्ति आय यदि विदेशी मुद्रा में कम दिखाई देती है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वहाँ प्रत्येक वस्तु उतनी ही महंगी है जितनी अमेरिका या यूरोप में। स्थानीय कीमतें, मजदूरी और सेवाओं की लागत अलग होती है। इसलिए क्रय-शक्ति समता किसी अर्थव्यवस्था की घरेलू क्रय-क्षमता को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन एआई की कीमत तय करते समय केवल क्रय-शक्ति समता को भी अंतिम आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि किसी देश की औसत आय और उसके गरीब या निम्न-मध्यम आय वाले नागरिकों की वास्तविक खर्च करने की क्षमता में बहुत अंतर हो सकता है। यही कारण है कि एक ही देश में किसी बड़े शहर के उच्च आय वाले पेशेवर और छोटे शहर के विद्यार्थी के लिए समान एआई सदस्यता शुल्क का आर्थिक प्रभाव बिल्कुल अलग हो सकता है। विशेष रूप से भारत जैसे विशाल और आय-विविधता वाले देश में स्थानीय क्रय-शक्ति के अनुरूप एआई की कीमत निर्धारित करने की आवश्यकता अधिक महसूस होती है।
यह समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि दुनिया में डिजिटल असमानता अभी समाप्त नहीं हुई है। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के वर्ष दो हजार पच्चीस के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की लगभग तीन-चौथाई आबादी इंटरनेट का उपयोग कर रही है, लेकिन लगभग दो अरब बीस करोड़ लोग अब भी इंटरनेट से बाहर हैं और इनमें अधिकांश निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ के अनुसार निम्न और मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में लगभग साठ प्रतिशत में इंटरनेट सेवाएँ अभी भी वहनीयता की समस्या से प्रभावित हैं। इतना ही नहीं, निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में मोबाइल इंटरनेट पर होने वाला आय का बोझ उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कई गुना अधिक है। ऐसी स्थिति में यदि इंटरनेट तक पहुँच पहले ही महंगी है और उसके ऊपर एआई की सदस्यता भी विकसित देशों के समान रखी जाती है, तो विकासशील देशों के लोगों के लिए एआई तक वास्तविक पहुँच और भी कठिन हो जाएगी।
एआई को केवल मनोरंजन या अतिरिक्त सुविधा मानना अब उचित नहीं होगा। एक विद्यार्थी इसका उपयोग कठिन विषय समझने, भाषा सीखने और अध्ययन सामग्री तैयार करने में कर सकता है। शिक्षक पाठ्य सामग्री और शिक्षण योजनाएँ विकसित कर सकते हैं। शोधकर्ता साहित्य समीक्षा, आँकड़ों के संगठन और प्रारंभिक विश्लेषण में सहायता ले सकते हैं। छोटा व्यापारी विपणन, ग्राहक सेवा और बाजार अनुसंधान में एआई का उपयोग कर सकता है। स्वतंत्र पेशेवर लेखन, अनुवाद, डिजाइन और डिजिटल सेवाओं की गुणवत्ता तथा उत्पादकता बढ़ा सकता है। इस प्रकार एआई तक सस्ती पहुँच वास्तव में मानव पूंजी और आर्थिक उत्पादकता में निवेश है। यदि विकासशील देशों के लोगों को महंगी सदस्यता के कारण अत्याधुनिक एआई से दूर रखा जाता है, तो भविष्य में विकसित और विकासशील देशों के बीच केवल आय का ही नहीं, बल्कि ज्ञान, कौशल और उत्पादकता का अंतर भी बढ़ सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में पहले से मौजूद असमानताएँ और अधिक गहरी हो सकती हैं।
विश्व बैंक ने विकासशील देशों में एआई की समावेशी पहुँच के लिए संपर्क सुविधा, संगणना क्षमता, स्थानीय संदर्भ और दक्षता को महत्वपूर्ण आधार माना है। उच्च आय वाले देशों में इंटरनेट का उपयोग करने वाली आबादी का अनुपात निम्न आय वाले देशों की तुलना में बहुत अधिक है। इसका अर्थ यह है कि एआई की समस्या केवल सदस्यता शुल्क की नहीं है, बल्कि इंटरनेट, उपकरण, बिजली, डिजिटल कौशल और स्थानीय भाषाओं की उपलब्धता से भी जुड़ी है। इसलिए सस्ती एआई सदस्यता एक बड़े समाधान का केवल एक हिस्सा है, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि किसी गरीब देश में एआई की सदस्यता बहुत सस्ती भी कर दी जाए, लेकिन इंटरनेट महंगा हो, बिजली की समस्या हो, उपयुक्त उपकरण उपलब्ध न हों और लोगों को एआई का उपयोग करना न आता हो, तो तकनीक का लाभ सीमित ही रहेगा। इसलिए एआई की कीमत कम करने के साथ डिजिटल आधारभूत ढाँचे और कौशल विकास पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
एआई कंपनियों को विकासशील देशों के लिए एक समान वैश्विक कीमत के बजाय क्रय-शक्ति आधारित मूल्य निर्धारण अपनाना चाहिए। जिस प्रकार अनेक वैश्विक डिजिटल सेवाएँ अलग-अलग बाजारों में अलग कीमतें निर्धारित करती हैं, उसी प्रकार एआई के लिए भी क्षेत्रीय मूल्य निर्धारण की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। उच्च आय वाले देशों में सामान्य या प्रीमियम कीमत रखी जा सकती है, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थानीय आय तथा क्रय-शक्ति के अनुरूप कम कीमत रखी जाए। विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, गैर-लाभकारी संस्थाओं और छोटे व्यवसायों के लिए विशेष दरें निर्धारित की जा सकती हैं। गरीब देशों में विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक पुस्तकालयों और प्रशिक्षण संस्थानों के लिए सामूहिक सदस्यता उपलब्ध कराकर बड़ी संख्या में लोगों तक एआई पहुँचाया जा सकता है। इससे कंपनियों को केवल कम कीमत के कारण होने वाली संभावित आय-हानि की चिंता नहीं करनी होगी, क्योंकि बड़े उपयोगकर्ता आधार से दीर्घकाल में बाजार का विस्तार भी हो सकता है।
विकासशील देशों में कम एआई शुल्क को कंपनियों पर बोझ के रूप में देखने के बजाय दीर्घकालीन बाजार निवेश के रूप में देखना चाहिए। आज का विद्यार्थी कल का पेशेवर, उद्यमी, शोधकर्ता या ग्राहक बन सकता है। आज किसी छोटे व्यवसाय को सस्ती एआई सेवा उपलब्ध कराने से भविष्य में वही व्यवसाय बड़े स्तर का व्यावसायिक ग्राहक बन सकता है। कम कीमत पर अधिक लोगों को एआई से जोड़ना एआई कंपनियों के लिए नए बाजार, नए अनुप्रयोग और स्थानीय भाषाओं में नए नवाचारों का आधार बन सकता है। खासकर भारत, इंडोनेशिया, ब्राजील और अफ्रीका के अनेक देशों जैसे विशाल युवा बाजारों में यह रणनीति कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से भी लाभकारी हो सकती है। अधिक उपयोगकर्ता केवल वर्तमान आय नहीं बढ़ाते, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़ा और स्थायी बाजार भी तैयार करते हैं।
एआई की वहनीयता को स्थानीय भाषाओं से भी जोड़ना होगा। यदि किसी भारतीय, अफ्रीकी या एशियाई उपयोगकर्ता को एआई का पूरा लाभ लेने के लिए अंग्रेजी में दक्ष होना पड़े, तो तकनीक की पहुँच स्वतः सीमित हो जाती है। स्थानीय भाषाओं में बेहतर एआई सेवाएँ और कम कीमत का संयोजन डिजिटल समावेशन को बहुत अधिक प्रभावी बना सकता है। भारत में हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में एआई की गुणवत्ता बढ़ाना इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके साथ स्थानीय भुगतान प्रणालियों को स्वीकार करना भी आवश्यक है, क्योंकि केवल स्थानीय मुद्रा में कीमत दिखाना पर्याप्त नहीं है। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थी, शिक्षक, छोटे व्यवसायी और निम्न आय वाले उपयोगकर्ता अंतरराष्ट्रीय बैंक कार्ड के बिना भी एआई सेवाओं का भुगतान कर सकें। स्थानीय भाषा और स्थानीय भुगतान व्यवस्था एआई की वास्तविक पहुँच को बहुत व्यापक बना सकती है।
अंततः यह समझना होगा कि एआई आने वाले समय में केवल एक व्यावसायिक उत्पाद नहीं रहेगा। यह शिक्षा, रोजगार, शोध और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। इसलिए इसकी पहुँच केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए जो ऊँची सदस्यता शुल्क वहन कर सकते हैं। दुनिया में आर्थिक समानता नहीं है, इसलिए वास्तविक समानता के लिए कई बार कीमतों में अंतर आवश्यक होता है। विकसित देशों में अधिक कीमत और विकासशील देशों में स्थानीय क्रय-शक्ति के अनुरूप कम कीमत कोई अनुचित व्यवस्था नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से अधिक तर्कसंगत और सामाजिक रूप से अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था हो सकती है। एआई का भविष्य तभी वास्तव में वैश्विक होगा जब उसकी शक्ति केवल अमीर देशों और उच्च आय वाले वर्गों तक सीमित न रहकर विकासशील देशों के विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, छोटे उद्यमियों और सामान्य नागरिकों तक पहुँचे। इसलिए एआई उद्योग को भविष्य की मूल्य निर्धारण नीति का मूल सिद्धांत यही बनाना चाहिए कि एक दुनिया होने का अर्थ एक ही कीमत होना नहीं है; वास्तविक वैश्विक समानता के लिए कीमतें लोगों की वास्तविक क्रय-शक्ति के अनुरूप होनी चाहिए। यही एआई के आर्थिक लोकतंत्रीकरण, ज्ञान के प्रसार और अधिक न्यायपूर्ण डिजिटल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
