– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
रक्षा बंधन हजारों वर्षों का भारतीय संस्कार है। कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन को लेकर उठे विवाद ने वस्त्र, स्त्री की स्वतंत्रता और विज्ञापन की रचनात्मकता से कहीं बड़ा प्रश्न हमारे सामने रखा है। प्रश्न यह है कि क्या किसी पवित्र सांस्कृतिक पर्व को बाजार की दृष्टि से प्रस्तुत करते समय उसकी मर्यादा, प्रतीक और धार्मिक भावभूमि का भी ध्यान रखा जाना चाहिए या नहीं ? उत्तर है, निश्चित रूप से। क्योंकि परंपरा मनुष्य की स्वतंत्रता को संस्कारित करती है।
देह क्या है? कुछ अस्थियां, मांस, मज्जा और चमड़ी का पुंज। यही देह जब प्राण से जुड़ती है तो जीवित होती है और जब प्राण उससे निकल जाता है तो वही देह शव कहलाती है। अंतर दिखाई देने वाले शरीर और भीतर उपस्थित चेतना मय शरीर दोनों का यहां स्पष्ट देखा जा सकता है। इसी प्रकार सामान्य देह और संस्कारित देह में भी अंतर सामने दिखाई देने वाली आकृति का न होकर भीतर अर्जित संस्कारों का होता है।
भारतीय चिंतन ने मनुष्य को उसकी देह तक सीमित करके कभी नहीं देखा। यहां शरीर साधन है, साध्य को साधने का। देह के साथ मन है, मन के साथ बुद्धि है, चित्त है और इन सबके ऊपर संस्कारों से निर्मित वह चेतना है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है, इसीलिए भारतीय संस्कृति में आचरण का महत्व सबसे अधिक है। व्यक्ति क्या पहनता है, यह उसका व्यक्तिगत विषय हो सकता है, किंतु वह किस अवसर पर, किस संदर्भ में और किस भाव के साथ स्वयं को प्रस्तुत करता है, यह सामाजिक और सांस्कृतिक समझ है और यहीं से रक्षा बंधन का महत्व समझ में आता है।
माना कि राखी, रेशम, सूत या रंगीन धागे से बनी वस्तु है। मगर वह एक संबंध का संस्कार भी है। बहन, भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। उसके पीछे मंगलकामना है, स्नेह है, विश्वास है और एक-दूसरे के प्रति दायित्व का भाव बोध भी है। यह पर्व परिवार को स्मरण कराता है कि संबंध अधिकार जताने के साथ जिम्मेदारियां उठाने से जुड़ा हुआ है। तभी भारतीय परंपरा ने जीवन के सामान्य संबंधों को भी संस्कार में बदल दिया। माता-पिता वे पूज्य हुए। गुरु ज्ञान का माध्यम बने। विवाह संस्कार बना। इसी क्रम में भाई-बहन का संबंध भी रक्षा बंधन के माध्यम से एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण करता है, इसलिए रक्षा बंधन को आधुनिक फैशन, आभूषण या उपहार के बाजार की दृष्टि से देखना उसके अर्थ को छोटा करना है।
इसी संदर्भ में कृति सेनन का रक्षाबंधन विज्ञापन विवाद महत्वपूर्ण हो जाता है। विज्ञापन में अभिनेत्री ऑफ-व्हाइट ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट में दिखाई दीं। विज्ञापन का दृश्य रक्षाबंधन से जुड़ा था। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके परिधान को लेकर प्रश्न उठे। विज्ञापन में पालतू कुत्ते को राखी बांधने वाले दृश्य पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। विवाद बढ़ा तो कंगना रनौत ने भी विज्ञापन पर तीखी टिप्पणी की। बाद में जीवा ने विज्ञापन को सभी मीडिया प्लेटफॉर्म से वापस ले लिया और कहा कि वह भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों का सम्मान करती है।
यहां जो समझनेवाली बात है, वह यही है कि व्यक्ति अपने निजी जीवन में क्या पहनता है, यह उसकी स्वतंत्रता का विषय है, किंतु जब वही व्यक्ति किसी धार्मिक पर्व के विज्ञापन का हिस्सा बनता है, तब वह अकेला व्यक्ति नहीं रहता, वह उस दृश्य की सांस्कृतिक भाषा का हिस्सा बन जाता है। वहां वस्त्र, आभूषण, भाव-भंगिमा, संवाद, संगीत और दृश्य संयोजन मिलकर एक संदेश बनाते हैं, इसलिए प्रश्न अभिनेत्री के कपड़े भर का नहीं है। प्रश्न यह है कि रक्षा बंधन को दिखाने के लिए विज्ञापन ने कैसी सांस्कृतिक भाषा चुनी?
यही पर आकर लगता है कि भारत में “कल्चरल मार्क्सिज्म” अपने नए छद्म रूपों में भारत पर हावी होने के लिए षड्यंत्र कर रहा है । बेशक, बाजार की अपनी भाषा है। वह आकर्षण चाहता है, ध्यान चाहता है, चर्चा चाहता है और अंततः बिक्री चाहता है, किंतु धर्म और संस्कृति की भाषा अलग है। वह स्मृति, श्रद्धा, संबंध, संयम और दायित्व की भाषा है। जब बाजार किसी धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व को अपने प्रचार का माध्यम बनाता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि वह एक सांस्कृतिक प्रतीक को भी सार्वजनिक रूप दे रहा है।
परंपरा नदी की तरह है। वह आगे बढ़ती है, उसमें नए जल का प्रवेश होता है, उसके किनारे बदलते हैं, किंतु उसकी धारा बनी रहती है। यदि नदी का जल ही समाप्त कर दिया जाए तो फिर सिर्फ नाम बचता है। इसी प्रकार यदि उत्सव का सांस्कृतिक भाव समाप्त हो जाए और उसका बाजार बचा रहे, तब उत्सव का संस्कार ही समाप्त हो जाता है। रक्षा बंधन की मर्यादा उस भाव में है जिसमें भाई-बहन एक-दूसरे को अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। पर इस मर्यादा का अर्थ यह भी है कि पर्व को प्रस्तुत करते समय उसके सांस्कृतिक संकेतों के प्रति संवेदनशीलता रखी जाए।
क्या पालतू पशु से प्रेम गलत है? बिल्कुल नहीं। भारतीय परंपरा तो जीवमात्र में ईश्वर का अंश देखने की बात करती है। पशुओं के प्रति करुणा भारतीय जीवन-दृष्टि का हिस्सा है। लेकिन किसी विशेष धार्मिक संस्कार के मूल प्रतीक और उसके विस्तार के बीच भी अंतर समझना होगा। हर अच्छी भावना को हर धार्मिक अनुष्ठान के साथ जोड़ देना आवश्यक नहीं है। प्रत्येक परंपरा की अपनी संरचना, प्रतीक और मर्यादा होती है। यही विवेक संस्कृति को संस्कृति बनाए रखता है, इसलिए कृति सेनन के विज्ञापन का विवाद किसी एक अभिनेत्री, किसी एक ब्रांड या किसी एक परिधान तक सीमित करके देखना उचित नहीं।
आज का सच यही है कि यह हमारे समय के सामने खड़ा बड़ा सांस्कृतिक प्रश्न है। क्या हम अपने त्योहारों को उनके मूल अर्थ के साथ आधुनिक जीवन में आगे बढ़ाएंगे? क्या बाजार हमारी परंपराओं से लाभ लेते हुए उनके प्रति उत्तरदायी भी रह सकता है? क्या स्वतंत्रता के साथ मर्यादा का संतुलन बनाया जा सकता है? भारतीय उत्तर स्पष्ट है-हां। सोचना अब उन तमाम कंपनियों को है, जो उत्सव में उसके मूल को न देख सिर्फ बाजार खोज रही हैं। हमें स्वतंत्रता चाहिए, किंतु स्वच्छंदता नहीं। आधुनिकता चाहिए, पर आत्मविस्मृति नहीं। सौंदर्य चाहिए, मगर संदर्भहीन प्रदर्शन नहीं। बाजार चाहिए, परन्तु संस्कृति की कीमत पर नहीं।
क्योंकि देह मनुष्य की पहली पहचान हो सकती है, अंतिम नहीं। अंतिम पहचान उसके संस्कारों से बनती है और रक्षा बंधन उसी संस्कार का पर्व है। वह कलाई पर बंधता जरूर है, पर संबंध हृदय से होता है। वह धागे में दिखाई देता है, मगर उसका अर्थ पीढ़ियों की स्मृति में छिपा होता है। यही कारण है कि भारतीय समाज अपने पर्वों से प्रेम करता है, उनसे स्वयं को पुनः पहचानता है। संस्कृति को आधुनिक बनाना अलग बात है और संस्कृति को बाजार की सुविधा के अनुसार बदल देना अलग। पहली प्रक्रिया जीवंत परंपरा है, दूसरी आत्मविस्मृति की शुरुआत हो सकती है, इसलिए इस पर्व की रक्षा किसी धागे से अधिक आवश्यक है उसके अर्थ की रक्षा। यही भारतीय धर्म की शक्ति है, यही उसकी मर्यादा है और यही उसकी निरंतरता का रहस्य भी है
