आज बाबू बटुकनाथ सुबह-सुबह ही गुज़र गए। मुहल्ले के उन लोगों की आँखों से भी आँसू छलक पड़े, जो कभी उनसे ईर्ष्या करते थे।
पत्नी के जाने के बाद पिछले कई सालों से बटुकनाथ अपने ही घर में अकेले अपने हाथों से खाना बना रहे थे। बुढ़ापे में घर-संपत्ति से मोह और बढ़ जाता है, उसे छोड़कर वे कहीं और जाना ही नहीं चाहते थे।
कभी बिजली विभाग में उनका सिक्का चलता था। तब बिजली विभाग में पैसों की बरसात होती थी और आज भी कमोबेश वैसा ही है। अपनी वाक्पटुता से ग्राहकों को अपनी डोर में फँसा लेना उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था। एक-एक बिजली कनेक्शन के नाम पर उन्होंने खूब पैसा कमाया था।
पाँच साल पहले कोरोना में पत्नी गीता के देहावसान ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया। तीन बेटियाँ थीं, तीनों अपने-अपने घर में बसी थीं। यदा-कदा जब उन्हें पैसों की दिक्कत होती तो पति के साथ आतीं, दो-चार दिन रहतीं, अपना स्वार्थ सिद्ध करतीं और फिर अपने घर की राह पकड़ लेतीं।
बुढ़ापा अपने आप में एक बीमारी है। जरा और मृत्यु जीवन के अटल सत्य हैं। इसी सत्य के मार्ग पर बटुकनाथ का शेष जीवन चल रहा था। जब तक पौरुष था, सुबह-शाम दो रोटी सेंक लेते थे। अब पौरुष ढीला हो रहा था। आज रोटी सेंकते समय तवा हाथ से छूट गया और वे वहीं गिर पड़े।
काफी देर बाद मुहल्ले का एक युवक बंटी, जो कभी-कभार उनका कुशल-क्षेम पूछने आ जाता था और बाजार से सामान ला देता था, उधर से गुजरा। उसने देखा कि चाचा के मकान में गहरा सन्नाटा है। उसके कदमों ने गति बढ़ा दी। दरवाजा खुला था।
“चच्चा… चच्चा…” कहता हुआ वह रसोई की ओर गया तो अवाक रह गया। आटा सना पड़ा था, रोटी जल कर कोयले में तब्दील हो गई थी और चाचा गश खाकर वहीं लुढ़के थे। आगे नाथ न पीछे पगहा।
एक समय था, चालीस साल पहले जब गीता को ब्याह कर लाए थे और पाँच साल के भीतर तीन बेटियों से आँगन भर गया था। बेटियों की किलकारियों से आँगन के पौधे लहलहा रहे थे, मंगल गीत गाए जा रहे थे, लोग बधाई दे रहे थे कि बटुकनाथ के घर लक्ष्मी आई है! तब का वह दिन और आज का यह दिन – जीवन के दो छोरों में कितना फर्क हो जाता है।
बंटी ने तुरंत पानी के छींटे मारे। आँखें नहीं खुलीं, पर साँसें चल रही थीं। तपाक से उसने बेटे गणेश को फोन किया, “तुरंत ऑटो लेकर आओ, चाचा बेहोश हो गए हैं!”
दस मिनट में गणेश ऑटो लेकर आ गया। चाचा को शहर के सिंह अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर विवेक ने कहा, “सिस्टर, इनको तुरंत आईसीयू में शिफ्ट करो।”
“यस सर!” सिस्टर राधा बोली।
थोड़ी देर में डॉक्टर ने बंटी से कहा, “हालत बहुत सीरियस है, ये दवाएँ तुरंत लेकर आओ।”
बंटी पशोपेश में पड़ गया। जेब में पाँच हजार रुपये थे। काउंटर पर पर्ची दी तो बीस हजार का बिल था। उसने कहा, “भैया, ये पाँच हजार रख लीजिए, बाकी मैं प्रबंध करता हूँ।”
उसने बारी-बारी से चाचा की तीनों बेटियों सुनीता, अनिता और दिव्या को फोन लगाया। दो ने फोन ही नहीं उठाया। दिव्या का फोन लग गया।
बंटी ने कहा, “चाचा की हालत खराब है, फौरन आ जाइए, सिंह अस्पताल में हैं।”
“भैया आप इलाज कराइए। ठीक है, मैं बीस हजार आपके खाते में भेज रही हूँ, मैं कल आऊँगी, आज मेरी बहुत इमरजेंसी मीटिंग है।”
बंटी ने जैसे-तैसे दवा आईसीयू में पहुँचाई। आधे घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए और बोले, “इनके परिवार में कोई हो तो बुला लीजिए, ही इज नो मोर!”
बंटी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।
तभी मुहल्ले के बाजपेयी जी, जो बटुकनाथ के मित्र थे, अस्पताल पहुँचे। बंटी ने कहा, “बाजपेयी चाचा, बटुक चाचा नहीं रहे।”
अस्पताल से ही अर्थी को रसूलाबाद घाट ले जाया गया। दाह-संस्कार बंटी ने ही किया।
रिश्ते में बंटी केवल उनका पड़ोसी था। वह भले ही गीता के गर्भ से जन्मा नहीं था, पर पुत्र की भाँति उसने सारी क्रियाएँ कीं।
आज बटुकनाथ को मरे बीस दिन हो गए, तीनों बेटियों और दामादों का कोई अता-पता नहीं था। लेकिन बंटी के भीतर एक आत्मतोष था कि इस जन्म में भले ही चाचा से मेरा खून का रिश्ता नहीं था, पर पूर्वजन्म में कोई न कोई गहरा रिश्ता जरूर रहा होगा।
सम्पूर्णानंद मिश्र
शिवपुर, वाराणसी
