कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब भविष्य की कोई दूर की तकनीक नहीं रह गई है। यह कार्यालयों, उद्योगों, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, मीडिया संस्थानों, बैंकों, न्याय व्यवस्था, मानव संसाधन प्रबंधन और सरकारी सेवाओं तक पहुंच चुकी है। भर्ती से लेकर कर्मचारी मूल्यांकन तक, ग्राहक सेवा से लेकर सामग्री निर्माण तक और निर्णय लेने से लेकर डेटा विश्लेषण तक एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इसी तेजी के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जो तकनीकी प्रगति से कहीं अधिक गंभीर सवाल उठाती है। 16 सितंबर 2026 को प्रकाशित एचआर ड्राइव की रिपोर्ट के अनुसार, एलआरएन के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि 10 में से 1 से भी कम संस्थागत आचार-संहिताओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या तकनीकी नैतिकता का स्पष्ट उल्लेख है। यानी जिन संस्थाओं में कर्मचारियों से नैतिक आचरण की अपेक्षा की जाती है, उनमें से बड़ी संख्या ने उस तकनीक के लिए स्पष्ट नैतिक दिशा-निर्देश ही तैयार नहीं किए हैं जो अब उनके कामकाज को प्रभावित कर रही है।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आचार-संहिता केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं होती। उसका उद्देश्य कर्मचारियों को यह बताना होता है कि कठिन परिस्थितियों में संगठन उनसे किस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करता है। लेकिन यदि कर्मचारी प्रतिदिन एआई का उपयोग कर रहा है और संगठन की आचार-संहिता में एआई से जुड़े प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है, तो वह कर्मचारी कई महत्वपूर्ण निर्णयों में अपने विवेक, सुविधा या तत्काल लक्ष्य पर निर्भर हो सकता है। क्या किसी कर्मचारी को गोपनीय दस्तावेज किसी सार्वजनिक एआई प्रणाली में डालना चाहिए? क्या एआई से तैयार सामग्री को बिना सत्यापन के आधिकारिक रिपोर्ट में इस्तेमाल किया जा सकता है? यदि एआई किसी उम्मीदवार को भर्ती प्रक्रिया में बाहर कर देता है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? यदि एआई द्वारा तैयार सूचना गलत निकलती है तो जवाबदेही किसकी होगी? यदि किसी कर्मचारी के प्रदर्शन का आकलन किसी एल्गोरिदम से किया जाता है तो कर्मचारी को उस निर्णय को समझने और चुनौती देने का अधिकार होना चाहिए या नहीं? ऐसे प्रश्न अब काल्पनिक नहीं हैं।
एलआरएन के अध्ययन से जुड़ी एचआर ड्राइव की रिपोर्ट यह भी बताती है कि लगभग 2,000 पूर्णकालिक कर्मचारियों में लगभग सभी ने कहा कि उनके नियोक्ता उनसे आचार-संहिता को स्वीकार करने या उसके अनुपालन की पुष्टि करने की अपेक्षा करते हैं। लेकिन आचार-संहिता को वास्तविक मार्गदर्शक के रूप में इस्तेमाल करने वाले कर्मचारियों का अनुपात घटा है। लगभग 5 में से 1 कर्मचारी ने कहा कि उनकी आचार-संहिता में व्यावहारिक मार्गदर्शन का अभाव है। यह तथ्य हमें एक बड़े प्रश्न तक ले जाता है—क्या संस्थानों में आचार-संहिताएं केवल अनुपालन की औपचारिकता बनती जा रही हैं, जबकि वास्तविक कार्यस्थल की समस्याएं उनसे आगे निकल चुकी हैं?
एआई के मामले में यह अंतर और भी गंभीर है। तकनीक का विकास संस्थागत नीतियों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से हो रहा है। कुछ वर्ष पहले तक अधिकांश कर्मचारियों के लिए एआई का अर्थ मुख्यतः स्वचालन या मशीन लर्निंग था। आज जनरेटिव एआई, बड़े भाषा मॉडल और एआई एजेंट कार्यालयी कार्यों के अनेक हिस्सों में प्रवेश कर चुके हैं। कर्मचारी ईमेल लिखने, रिपोर्ट तैयार करने, डेटा का विश्लेषण करने, प्रस्तुतियां बनाने, कोड लिखने, अनुवाद करने और शोध में एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसे में केवल यह कहना कि “तकनीक का जिम्मेदारी से उपयोग करें” पर्याप्त नहीं है। जिम्मेदार उपयोग का अर्थ क्या है, यह भी स्पष्ट करना होगा।
यहां गोपनीयता का प्रश्न सबसे पहले सामने आता है। किसी संगठन के पास कर्मचारियों, ग्राहकों, मरीजों, विद्यार्थियों या व्यापारिक साझेदारों से संबंधित संवेदनशील जानकारी हो सकती है। यदि कर्मचारी सुविधा के लिए ऐसी जानकारी किसी बाहरी एआई प्रणाली में डाल देता है, तो डेटा सुरक्षा और गोपनीयता से जुड़े गंभीर प्रश्न पैदा हो सकते हैं। इसलिए संस्थागत एआई नीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि कौन-सा डेटा एआई उपकरणों में डाला जा सकता है, कौन-सा डेटा प्रतिबंधित है और किन परिस्थितियों में संगठन द्वारा स्वीकृत एआई प्रणालियों का ही उपयोग किया जाना चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न है—सटीकता और सत्यापन। जनरेटिव एआई उपयोगी सामग्री तैयार कर सकता है, लेकिन उसका आउटपुट स्वतः सत्य का प्रमाण नहीं बन जाता। गलत तथ्य, काल्पनिक संदर्भ, गलत आंकड़े और भ्रमित करने वाले उत्तर संभव हैं। इसलिए यदि एआई किसी रिपोर्ट, समाचार, शोध, कानूनी दस्तावेज या प्रशासनिक निर्णय के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो मानव सत्यापन आवश्यक हो सकता है। संगठन की आचार-संहिता को यह निर्धारित करना चाहिए कि किस प्रकार के कार्यों में मानव समीक्षा अनिवार्य होगी।
तीसरा प्रश्न निष्पक्षता का है। एआई प्रणालियां जिन आंकड़ों और प्रक्रियाओं पर आधारित होती हैं, उनमें मौजूद पूर्वाग्रह उनके परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। भर्ती, पदोन्नति, कर्मचारी मूल्यांकन, ऋण, बीमा और अन्य महत्वपूर्ण निर्णयों में यदि एआई का इस्तेमाल किया जाता है तो यह देखना जरूरी है कि क्या किसी समूह के साथ व्यवस्थित रूप से असमान व्यवहार तो नहीं हो रहा। SHRM ने भी कार्यस्थल में एआई के नैतिक उपयोग के संदर्भ में स्पष्ट अपेक्षाओं, प्रशिक्षण, संचार और नेतृत्व की जिम्मेदारी पर जोर दिया है।
चौथा प्रश्न जवाबदेही का है। मशीन निर्णय ले सकती है, लेकिन नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी अंततः किसी व्यक्ति या संस्था के स्तर पर तय होनी ही होगी। “एल्गोरिदम ने ऐसा किया” किसी संगठन के लिए पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता। यदि एआई किसी कर्मचारी के प्रदर्शन के बारे में गलत निष्कर्ष निकालता है, किसी उम्मीदवार को अनुचित रूप से अस्वीकार करता है या किसी ग्राहक को गलत सूचना देता है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्णय की समीक्षा कौन करेगा और शिकायत किसके पास जाएगी।
यही कारण है कि एआई नैतिकता को केवल आईटी विभाग की जिम्मेदारी मानना उचित नहीं होगा। मानव संसाधन विभाग, कानूनी विभाग, डेटा सुरक्षा अधिकारी, वरिष्ठ प्रबंधन, तकनीकी विशेषज्ञ और संबंधित कार्यक्षेत्र के विशेषज्ञ—सभी की भूमिका हो सकती है। यूनेस्को की ‘कृत्रिम मेधा की नैतिकतओं पर संस्तुति’ (Recommendation on the Ethics of Artificial Intelligence) मानवाधिकार, मानवीय गरिमा, पारदर्शिता, निष्पक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता और मानव निगरानी जैसे सिद्धांतों को एआई के नैतिक उपयोग के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रखती है।
दुनिया भर में एआई नैतिकता को लेकर सिद्धांतों की कमी नहीं है। 200 एआई-नीति और नैतिक दिशा-निर्देशों के एक वैश्विक अध्ययन में पारदर्शिता, न्याय और निष्पक्षता, गैर- हानिकारकता, जिम्मेदारी और गोपनीयता जैसे सिद्धांतों में व्यापक समानताएं पाई गई थीं। समस्या इसलिए केवल सिद्धांतों की अनुपस्थिति नहीं है; बड़ी चुनौती इन सिद्धांतों को संस्थागत व्यवहार में बदलने की है। किसी वेबसाइट पर “हम जिम्मेदार एआई के लिए प्रतिबद्ध हैं” लिख देना और कर्मचारियों को वास्तविक परिस्थितियों में निर्णय लेने के लिए स्पष्ट नियम देना—इन दोनों में बड़ा अंतर है।
एचआर ड्राइव की रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू व्यापक नैतिक वातावरण से जुड़ा है । एलआरएन के निष्कर्षों के अनुसार, केवल 66% कर्मचारियों को लगा कि वे प्रतिशोध के डर के बिना कदाचार की रिपोर्ट कर सकते हैं, जबकि पिछले वर्ष यह आंकड़ा 71% था। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि HR Acuity के एक सर्वेक्षण में 2025 में 55% कर्मचारियों ने कहा कि उन्होंने कार्यस्थल पर कदाचार का अनुभव किया या उसे देखा, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 41% था। ये आंकड़े अलग-अलग अध्ययनों से आते हैं और इन्हें सीधे एआई के कारण हुआ कदाचार नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन वे यह दिखाते हैं कि संस्थागत नैतिकता और भरोसे की व्यापक व्यवस्था अपने आप में महत्वपूर्ण विषय है।
इसलिए समाधान केवल आचार-संहिता में “एआई” शब्द जोड़ देना नहीं है। एलआरएन के अनुसार, संस्थाओं को जरूरी नहीं कि अलग से बहुत लंबा अध्याय तैयार करना पड़े; वे अपनी मौजूदा नैतिक अवधारणाओं—जवाबदेही, निष्पक्षता, पारदर्शिता और विवेकपूर्ण निर्णय—को एआई के उपयोग से जोड़ सकती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि नियम आसानी से उपलब्ध हों, कर्मचारियों को समझ में आएं और वास्तविक परिस्थितियों में लागू किए जा सकें।
एक प्रभावी संस्थागत एआई नीति में कम से कम कुछ बुनियादी प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट होने चाहिए। कौन-से एआई उपकरण स्वीकृत हैं? संवेदनशील डेटा के इस्तेमाल की सीमा क्या है? एआई से तैयार सामग्री के लिए मानव समीक्षा कब अनिवार्य है? कर्मचारी को एआई के उपयोग का खुलासा कब करना होगा? गलत या पक्षपाती आउटपुट की रिपोर्ट कैसे की जाएगी? महत्वपूर्ण निर्णयों में अंतिम अधिकार किसके पास रहेगा? एआई प्रणाली की समय-समय पर समीक्षा कौन करेगा? कर्मचारियों को प्रशिक्षण कौन देगा? और सबसे महत्वपूर्ण—यदि कोई कर्मचारी सद्भावना से एआई से जुड़े नैतिक जोखिम की रिपोर्ट करता है, तो उसकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी?
यह नीति स्थिर दस्तावेज भी नहीं हो सकती। एआई तकनीक तेजी से बदल रही है। आज जो जोखिम महत्वपूर्ण है, वह कुछ महीनों बाद अलग रूप ले सकता है। इसलिए एआई नैतिकता को “एक बार नीति बनाकर भूल जाने” वाला विषय नहीं माना जा सकता। एचआर ड्राइव की रिपोर्ट में भी एआई नैतिकता संबंधी नीतियों को बदलती परिस्थितियों के साथ विकसित होने वाले “जीवंत दस्तावेज” के रूप में देखने की बात सामने आती है।
सबसे बड़ा खतरा शायद यह नहीं है कि संस्थाएं एआई का इस्तेमाल कर रही हैं। असली खतरा यह है कि वे एआई का इस्तेमाल तो कर रही हों, लेकिन उसके उपयोग की नैतिक सीमाओं पर पर्याप्त विचार न कर रही हों। तकनीक जितनी शक्तिशाली होती जाती है, उतनी ही महत्वपूर्ण मानव जिम्मेदारी भी होती जाती है। एआई तेज निर्णय दे सकता है, बड़ी मात्रा में डेटा संसाधित कर सकता है और अनेक कार्यों को स्वचालित कर सकता है, लेकिन वह अपने आप किसी संस्था के नैतिक मूल्यों का निर्धारण नहीं करता। यह काम मनुष्य और संस्थाओं को ही करना होगा।
आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एआई को केवल उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह कार्यस्थल की संस्कृति, अधिकारों, गोपनीयता, निष्पक्षता, रोजगार, निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत विश्वास को प्रभावित कर रहा है। इसलिए प्रत्येक संस्था के सामने अब एक बुनियादी प्रश्न है—क्या उसकी आचार-संहिता उस तकनीकी दुनिया के लिए तैयार है जिसमें उसके कर्मचारी पहले से काम कर रहे हैं?
यदि उत्तर नहीं है, तो समस्या केवल नीति की कमी नहीं है। यह उस अंतर का संकेत है जो तकनीकी परिवर्तन और संस्थागत जिम्मेदारी के बीच तेजी से बढ़ रहा है। इस अंतर को कम करना केवल आईटी विभाग या मानव संसाधन विभाग का काम नहीं, बल्कि नेतृत्व, कर्मचारी, नीति-निर्माता और तकनीकी विशेषज्ञ—सभी की साझा जिम्मेदारी है। एआई का भविष्य केवल इस बात से निर्धारित नहीं होगा कि मशीनें कितनी बुद्धिमान बनती हैं; यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा कि मनुष्य उनके इस्तेमाल के लिए कितनी स्पष्ट, पारदर्शी और जवाबदेह नैतिक व्यवस्था तैयार करते हैं।
डॉ. शैलेश शुक्ला
गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, गौड़सन्स टाइम्स
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