इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दुनिया जिस सबसे बड़े बदलाव की गवाह बन रही है, वह केवल आर्थिक या भू-राजनीतिक शक्ति का पुनर्संतुलन भर नहीं है, बल्कि उस बुनियादी तकनीक पर वर्चस्व की लड़ाई है जो भविष्य के मानव इतिहास की दिशा तय करने वाली है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सबसे तीखी धुरी बन चुकी है। वाशिंगटन और बीजिंग के गलियारों में चलने वाली चर्चाओं को यदि गौर से सुना जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों पक्षों के बीच चल रही तनातनी किसी भी सामान्य व्यापारिक मतभेद से कहीं आगे निकल चुकी है। यह आधुनिक युग का ऐसा तकनीकी टकराव है जिसकी गूंज सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन संयंत्रों से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मंचों तक सुनाई दे रही है। इसके बावजूद, इस कड़वी और अविश्वास से भरी प्रतिद्वंद्विता के गर्भ में एक ऐसा साझा संकट भी आकार ले रहा है, जो दोनों महाशक्तियों को एक ही मेज पर आमने-सामने बैठने के लिए विवश कर रहा है।
अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी संबंधों का इतिहास कभी साझेदारी और आपूर्ति श्रृंखलाओं के आपसी जुड़ाव पर आधारित हुआ करता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह समीकरण पूरी तरह बदल चुका है। वाशिंगटन की नीति अब साफ तौर पर चीन को उन्नत कंप्यूटिंग और फ्रंटियर मॉडल्स के क्षेत्र में बढ़त लेने से रोकने की रही है। उन्नत जीपीयू, चिप-निर्माण की आधुनिक मशीनों और अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर के निर्यात पर लगे कड़े प्रतिबंधों ने दोनों देशों के बीच एक ऐसी तकनीकी दीवार खड़ी कर दी है, जिसे लांघना अब आसान नहीं है। अमेरिकी नीति निर्धारकों का मानना है कि अत्याधुनिक मॉडलों पर बीजिंग का प्रभुत्व न केवल वैश्विक आर्थिक संतुलन को बिगाड़ेगा, बल्कि भविष्य के युद्धक्षेत्रों में भी अप्रत्याशित सैन्य बढ़त स्थापित कर देगा।
दूसरी ओर, चीन इस स्थिति को अपनी संप्रभुता और आर्थिक प्रगति को रोकने की एक सुनियोजित पश्चिमी रणनीति के रूप में देखता है। घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए चीन ने अभूतपूर्व वित्तीय संसाधन झोंक दिए हैं। बीजिंग का यह दृढ़ संकल्प है कि वह बाहरी तकनीकी दबावों के आगे नहीं झुकेगा। इस माहौल ने दोनों देशों के बीच संदेह की एक गहरी खाई खोद दी है। अमेरिका में जहां चीनी शोधकर्ताओं और तकनीकी कंपनियों द्वारा बौद्धिक संपदा तथा पश्चिमी मॉडलों से ज्ञान निकालने के प्रयासों को लेकर निरंतर चिंताएं उठाई जाती हैं, वहीं चीन इसे पश्चिमी तकनीक की अनुचित एकाधिकारवादी प्रवृत्ति करार देता है। इस गहरे अविश्वास के बावजूद एक कड़वी सच्चाई यह है कि तकनीक की प्रकृति राष्ट्रीय सीमाओं को नहीं पहचानती।
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो बीसवीं सदी का शीत युद्ध याद आता है। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच विचारधारा, भूगोल और हथियारों की भयानक होड़ थी, फिर भी दोनों पक्षों ने परमाणु अप्रसार और संकट प्रबंधन पर ऐतिहासिक समझौते किए थे। उन्हें यह भली-भांति ज्ञात था कि परमाणु हथियारों का अनियंत्रित प्रसार अंततः दोनों में से किसी को भी जीवित नहीं छोड़ेगा। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता के सबसे आधुनिक और स्वायत्त मॉडल उसी दोराहे पर खड़े हैं। यदि कोई स्वायत्त एआई एजेंट अनपेक्षित रूप से महत्वपूर्ण वित्तीय प्रणालियों को पंगु बना दे, बिजली ग्रिड को ठप कर दे, या साइबर सुरक्षा के बुनियादी तंत्र को भेद दे, तो उसका नुकसान किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा। फ्रंटियर मॉडलों का जैविक, रासायनिक या रेडियोलॉजिकल हथियारों के निर्माण में संभावित दुरुपयोग किसी राष्ट्र-राज्य की सीमा में बंधकर नहीं रहता। ऐसे हथियार यदि गैर-राज्य अभिनेताओं, आतंकी गुटों या अनियंत्रित गिरोहों के हाथ लग जाएं, तो उसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ेगा। यही वह बिंदु है जहां दोनों देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषाएं अनायास ही एक बिंदु पर आकर मिल जाती हैं। दोनों ही देश यह अच्छी तरह समझते हैं कि अनियंत्रित तकनीक जितनी खतरनाक उनके प्रतिद्वंद्वी के लिए है, उतनी ही विनाशकारी उनके स्वयं के आंतरिक तंत्र के लिए भी सिद्ध हो सकती है।
व्यावहारिक राजनीति और कूटनीति के यथार्थवादी नजरिए से देखा जाए, तो चीन और अमेरिका के बीच सहयोग किसी भावुक अंतरराष्ट्रीयतावाद या निःस्वार्थ दोस्ती पर आधारित नहीं हो सकता। यह शुद्ध रूप से आत्मरक्षा और अस्तित्वगत जोखिमों को कम करने की साझा आवश्यकता पर ही टिक सकता है। इस संदर्भ में सहयोग का सबसे पहला और तात्कालिक क्षेत्र सैन्य कमान और विशेषकर परमाणु नियंत्रण प्रणालियों में मानवीय हस्तक्षेप की अनिवार्यता है। युद्ध के आधुनिक सिद्धांतों में जिस गति से निर्णय लेने की प्रक्रिया में एल्गोरिदम को शामिल किया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है। यदि किसी मिसाइल चेतावनी प्रणाली या परमाणु कमान की प्रतिक्रिया को पूरी तरह स्वायत्त सॉफ्टवेयर के हवाले कर दिया जाए, तो किसी मामूली तकनीकी त्रुटि, भ्रामक संकेत या मॉडलों के मतिभ्रम के कारण दुनिया बिना किसी मानवीय निर्णय के विश्व युद्ध के मुहाने पर पहुंच सकती है। दोनों पक्षों को इस बुनियादी सिद्धांत पर एक औपचारिक और अटूट सहमति बनानी ही होगी कि परमाणु हथियारों के उपयोग का अंतिम और पूर्ण नियंत्रण केवल और केवल इंसानी हाथों में रहेगा।
सहयोग का दूसरा अनिवार्य क्षेत्र वैश्विक साइबर सुरक्षा और आपातकालीन पूर्व-चेतावनी प्रणाली का है। जिस प्रकार नागरिक उड्डयन या समुद्री यातायात के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम और आपातकालीन संपर्क सूत्र होते हैं, उसी प्रकार उन्नत मॉडलों के अचानक अनियंत्रित होने या बड़े पैमाने पर साइबर हमले शुरू करने की स्थिति में दोनों देशों के तकनीकी केंद्रों के बीच तत्काल सूचना साझा करने का एक सीधा तंत्र होना चाहिए। एक विश्वसनीय हॉटलाइन जैसी व्यवस्था, जो किसी गंभीर खतरे के समय दोनों पक्षों के तकनीकी सलाहकारों को तुरंत जोड़ सके, गलतफहमी के कारण होने वाले भारी विनाश को टाल सकती है।
इसके साथ ही, न्यूनतम सुरक्षा मानकों और मूल्यांकन परीक्षणों का निर्धारण भी बेहद जरूरी है। जब तक दोनों देश मॉडल की सुरक्षा को परखने के लिए एक साझा वैज्ञानिक भाषा या बेंचमार्क स्वीकार नहीं करते, तब तक नियामक स्तर पर अराजकता बनी रहेगी यदि एक देश सुरक्षा मानकों को ढीला छोड़ता है ताकि उसकी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ सकें, तो दूसरा देश भी अपनी सुरक्षा जांच को दरकिनार करने के लिए मजबूर होगा। सुरक्षा की अनदेखी करने का यह नकारात्मक मुकाबला दोनों पक्षों को एक गहरे खतरे में धकेल देता है। इसलिए, फ्रंटियर मॉडल्स के सार्वजनिक या वाणिज्यिक रोलआउट से पहले स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट के न्यूनतम वैश्विक मापदंड तय करना दोनों के साझा हित में है।
हाल के महीनों में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों और द्विपक्षीय बैठकों के दौरान दोनों पक्षों के शीर्ष स्तर पर जो संवाद देखने को मिला है, वह यह साबित करता है कि बंद कमरों में दोनों ही नेतृत्व इस तकनीक की संवेदनशीलता को पूरी गंभीरता से महसूस कर रहे हैं। राजनैतिक स्तर पर चाहे बयानबाजी कितनी भी आक्रामक और तल्ख क्यों न हो, पर्दे के पीछे काम करने वाले वैज्ञानिक, सुरक्षा विशेषज्ञ और रणनीतिकार यह भली-भांति स्वीकार करते हैं कि पूरी तरह से संवाद बंद कर देना आत्मघाती होगा।
ट्रैक-2 कूटनीति, जिसमें दोनों देशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक, शोधकर्ता और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल हैं, निरंतर संवाद के रास्ते तलाश रहे हैं। यह आदान-प्रदान तकनीक हस्तांतरण या व्यावसायिक व्यापार का नहीं, बल्कि सुरक्षा प्रोटोकॉल और जोखिम प्रबंधन के सिद्धांतों का है। यह समझना बेहद जरूरी है कि इस तरह के सहयोग का अर्थ यह कतई नहीं है कि दोनों देश अपनी प्रतिस्पर्धा समाप्त कर देंगे। वाशिंगटन चिप्स और हार्डवेयर पर अपनी पकड़ मजबूत रखने का हरसंभव प्रयास जारी रखेगा, और बीजिंग अपनी स्वदेशी तकनीकी क्षमता और सॉफ्टवेयर प्रभाव को विस्तार देने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
असली चुनौती इस बात में है कि क्या दोनों ताकतें अपनी इस उग्र होड़ के इर्द-गिर्द ऐसी मजबूत सुरक्षा रेलिंग लगा सकती हैं जो पूरी व्यवस्था को खाई में गिरने से बचा सके। यदि अमेरिका और चीन इस तकनीकी दौड़ को बिना किसी नियम-कायदे और संवाद के आगे बढ़ाते रहे, तो परिणाम केवल किसी एक देश की हार नहीं, बल्कि वैश्विक तकनीकी अराजकता होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि नेतृत्व अपनी वैचारिक और सामरिक तनातनी से एक कदम ऊपर उठकर यह पहचाने कि जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता को वे शक्ति का साधन मान रहे हैं, वह यदि नियंत्रण से बाहर हुई, तो उसका पहला शिकार वे स्वयं होंगे। प्रतिस्पर्धा जारी रह सकती है, लेकिन सहयोग की न्यूनतम जमीन तैयार करना इस सदी की सबसे बड़ी रणनीतिक और मानवीय जिम्मेदारी है।
डॉ. शैलेश शुक्ला
वैश्विक समूह संपादक
गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह
सलाहकार संपादक, गौड़सन्स टाइम्स
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