आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
आज दीपोत्सव पर श्रीवैभव लक्ष्मी के मंत्र – या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी। या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥ या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी। सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती ॥ “या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी” के पठन उपरांत माँ की महिमा का वर्णन और दीपपर्व मानते हुए घर- घरमाँ लक्ष्मी के आगमन की प्रतीक्षा के बीच की धनधान्यसुतान्वित अर्थात धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होने की मांगलिक कामना करता है। दीपपर्व की स्वामिनी दीप चण्डिका शक्तिपुन्ज स्वरूप होते हुए अपनी ज्योति किरणों से रक्ताम्बुजवासिनी अर्थात लाल कमल पर निवास करते हुए आकर्षक और सुंदर सूर्य के समान तेजस्विनी लाल वस्त्रों में भगवान विष्णु की प्रिय सखी होते हुए मन का हरण करती है और हम सभी भक्त समुद्र मंथन से प्रगटी माँ लक्ष्मी से प्रार्थना में लीन हो जाते है।
रक्ताम्बुजवासिनी माँ क्या अनभिज्ञ या अंजान होती है जो यह भी नही समझती की मिट्टी के दीपक का परिहास करने वाली विशाल महलनुमा भवनों – अट्टालिकाओं में भी ब्राह्य आकर्षक है, उजास है उनके भीतर कितना भीषण विकर्षण, अपराध और अनाचार का घनघोर अंधकार है, वे तथाकथित लक्ष्मीपु़त्र सामाजिक व्यवस्था और मानवीय आदर्शो को जलाकर ही तो अपना आवास इस अंधेंरी रात में जाज्वल्यमान कर रहे है, पुलकित हो रहे हैं, पर उनके मन में वह शंका अवश्य है कि सत्य और स्वत्व के अस्त्र से उनके मानवीय दुष्कर्मो को ध्वस्त करने के लिये कोई मर्यादा पुरूषोत्तम कहीं क्रांति का शंखनाद न फूंक दें? माँ शक्तिपुंज होते हुए भारत के करोड़ों दलित, शोषित, सर्वहारा वर्ग के निरीह, निरक्षक,गरीब और शोषित जनता के मन मंदिर की एक खण्डित प्रतिमा क्यों बनी हुई है जो भग्न भारत के स्वरूप को तो प्रगट कर विश्व के मानचित्र पर दृश्यमान करती है किन्तु राजनेताओं, दलों और सरकार के झूठे वायदों के तिलिश्म से मुक्त नहीं करा पा रही है और उल्लुओं का उल्लू बनाकर छोड़ दिया है,अगर लक्ष्मी माँ इन्हें अपना ही उल्लू बना ले तो ये आपकी कृपा से अपने जीवन की नौका का पार लगा सभी प्रकार के नैसर्गिक सुख, साधन और सम्पदा से भरपूर हो सकेंगे।
हे दीपरुपी चण्डिके, आप देख रही है कि आजादी के 78 साल बाद भी भारत की अधिंकाश आबादी आज भी दो जून भरपेट भोजन की जुगाड़ नहीं कर पाती। मिलावट, घुंसखोरी बेरोजगार और अभूतपूर्व मॅहगाई ने महामारी का रूप ले लिया है। जनकल्याण के लिये अपना सर्वस्य न्यौछावर करने वाले ऋषिमुनियों के इस देश में पुनः कंस, रावण हिरनाक्ष्य और हिरण्यकश्यप जैसी दानवी शक्तियां जनजीवन को चुनौतियां दे रही है, जनता को जीने के लाले पड़े हैं और देश अनेक विषमताओं के जाल में फॅसकर विश्व में अपनी अहमियत खोता जा रहा है, किन्तु स्वार्थपरक राजसत्ता ढ़ोल बजाकर धर्मराज युधिष्ठर की भांति अश्वस्थामा मारा गया का अर्द्धसत्य नाद कर शोषणरत है।
माते आप चण्डांशु तेजस्विनी: अर्थात सूर्य के समान तेजस्विनी हो तथा स्वर्ग के प्राकृतिक नैसर्गिक तत्वों की अपार संपदा की स्वामिनी होते हुए स्वर्ग को अपनी ज्योति किरणों की अक्षुण्य स्वर्णिम आभा से देदीप्यमान रखती हो वहीँ कार्तिक अमावस्या को जब यह धरती गहन अंधकार के आवरण से ढकी हुई होती है तब तुम जागरण की ज्योति किरणों का पस्फुरण माटी के दीपों से होने पर जन-जन द्वारा प्रज्वलित किये गए दीपदान से अवतरित होकर धरती के अन्धकार को निगलने के लिए चंडी बन सभी को स्वर्गिक आनन्द से भर देती हो। माँ आप ज्योतिस्वरूप हो इस पृथ्वी पर अंधकार के नाश के लिए अवतीर्ण होती हो और ज्योति पर्व के दीपों से गहन रात्रि के अंधकार का भेदन कर धरावासियों के दुर्भाग्य को सोभाग्य में परिवर्तित करती हो, इस तरह आप दीपावली की कालिमाभरी रात्री को स्वर्गिक बनाकर अपनी अहेतुक कृपाकरती हो। जिस प्रकार दीप चंडिका, चंडिका के र्रूप में अंधकार का दर्प चूर-चूर कर धरा के गहन अंधकार का भक्षण करके अपनी ज्योति किरणों की उजास को नभ तक विस्तीर्ण करती हो तब धरा के गरीब से गरीब व्यक्ति दीप ज्योति का प्रकाश कर नभ के उजाले को उज्ज्वल ज्योति किरण बनाने झूम उठता है और आतिशबाजी- से आपका अभिनन्दन करता है!
भारत ही नही अपितु दुनिया के हर मानवीय हृदय में ज्योतिपर्व का उल्लास आनंद मनाते हुए यह भाव जागते है की हे ज्योति किरण ! जिस तरह आप अँधेरे का सीना चीरकर आलोक की आलोकिक किरण से आल्हाद जगाती हो वैसे ही इस धरती पर अनाचार, अत्याचार, स्वार्थ, लोभ –लालच और द्वेष को अपने पवित्र पैरों से कुचलकर नूतन वैचारिक समझ और सोच की प्रज्ञा का मार्ग प्रशस्त कर कलियुग में सतयुग का आगाज कर समय की परिधि की हरेक ललकार को सहज ही प्रतिउत्तर दे सकती हो, जगत ही नही जगती भी जानता है की आपकी किरणों को निष्क्रियता, विवशता, असफलता और प्रमाद छू भी नहीं पाते है. इसलिए आप हम सभी के लिए वरदायिनी शक्ति हो और अनादिकाल से इस धरा के लोगों की मनोवांछित वरदानी होने पर सबका कल्याण करती आ रही हो!
जगत पर अपनी करुणा और कृपा लुटाने वाली हे वरदानी देवी ! आप सुख और समृद्धि की प्रतीक हो, किन्तु सुख और समृद्धि का जो अपार भंडार आप हमारे लिये लाती हो वह अभानिशा के अंधकार का लाभ उठाकर वे लुटेरे लूट लेते हैं जो इस धरती की संस्कृति के और मानवता के निर्मम शोषण को अपना धर्म मानते है। वे आपको छलते है, आपके साधक आराधकों की मिट्टी का छोटा सा दीप प्रज्वल्वित करने लायक भी नहीं रहने देते, भला बिना स्नेह तेल के दीप कैसे जल सकता है! आज तो तेल भी मणि मुक्ताओं की तरह अलभ्य हो गया है, इसकी जीवन दायिनी क्षमता, जीवन विनाशनी हो गयी है। देवी आज परिस्थितिया अत्यन्त विषम है किन्तु हमारी साधना के प्रतीक उस दीप क्षीणतम प्रकाश, नभचुंबी उतुंग आलिशान भवनों- अट्टालिकाओं की मंजिल-दर-मंजिल जगमगाती प्रकाश प्रभा में न जाने कैसे विलीन हो गया है, पूंजीपतियों काले कारनामों के सरगनाओं की अट्टालिकाओं और उनमें जगमगाते आलोक ने आपको बंदिनी बना लिया है। अस्तु, हे देवि! आज इस आलोक पर्व के दिन सर्वत्र व्याप्त अंधकार छाती चीरकर ऐसी आलोकिक रश्मियां बिखेर दे जिससे सारी दुनिया को नया प्रकाश, नयी प्रेरणा और नयी शक्ति मिल सके।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाईल -9993376616
