नई दिल्ली । प्रधान धार्मिक संगठन जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने भोपाल में एक सार्वजनिक सभा के दौरान भारतीय न्यायपालिका, सरकार और जिहाद के मुद्दे पर विवादास्पद बयान दिए। उन्होंने विशेष रूप से बाबरी मस्जिद और तीन तलाक मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को अल्पसंख्यकों के अधिकारों का उल्लंघन करार दिया और यह आरोप लगाया कि न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम कर रही है।
मौलाना मदनी ने सुप्रीम कोर्ट पर तीखा हमला करते हुए कहा कि अदालतें अब संविधान के बजाय बाहरी दबावों के तहत फैसले ले रही हैं। उन्होंने बाबरी मस्जिद के मसले को लेकर 1991 के का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब कानून के तहत यह स्पष्ट था कि कोई भी पूजा स्थल अपना धार्मिक स्वरूप नहीं बदल सकता तो बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर फैसला क्यों दिया गया इसके साथ ही उन्होंने तीन तलाक मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर आपत्ति जताई और कहा कि यह अल्पसंख्यकों के संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
मौलाना मदनी ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट को तब तक सुप्रीम कहा जा सकता है जब तक संविधान सुरक्षित हो। अगर यह संविधान के खिलाफ जाता है, तो कोर्ट इस नाम के हकदार नहीं रह जाता। उनका मानना था कि न्यायपालिका का यह रवैया अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के बजाय राजनीतिक दबावों के तहत काम करता है जो देश की धर्मनिरपेक्ष संरचना के लिए खतरनाक हो सकता है।
इसके बाद, मौलाना मदनी ने ‘जिहाद’ के विषय पर भी विवादास्पद टिप्पणी की। उन्होंने कहा, जहां जुल्म होगा वहां जिहाद होगा” और जिहाद को असली भलाई के लिए होने वाली एक सामाजिक धार्मिक प्रक्रिया बताया। उनके अनुसार जिहाद का वास्तविक अर्थ दूसरों की भलाई के लिए संघर्ष करना है, लेकिन मीडिया इसे नकारात्मक रूप से पेश करता है। उन्होंने लव जिहाद थूक जिहाद” और जमीन जिहाद जैसे शब्दों का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार और मीडिया ने जिहाद को एक दुष्ट और गलत रूप में पेश किया है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश है, और यहां पर जिहाद की कोई आवश्यकता नहीं है।
मौलाना मदनी ने मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे भारत के शेष खामोश 60% वर्ग से संवाद स्थापित करें क्योंकि अगर यह वर्ग अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो गया तो देश में सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के नेताओं से यह भी कहा कि वंदे मातरम जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों के बारे में भ्रामक विचारों से बचना चाहिए। उनका कहना था कि जो समुदाय डर और दबाव में जी रहा होता है वह आसानी से सरेंडर कर देगा और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति निष्ठा दिखाने लगेगा।
इन बयानों के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के रूप में देखा, जबकि अन्य ने इसे संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ एक हमला करार दिया। मौलाना मदनी के बयान ने न्यायपालिका और धार्मिक मुद्दों पर नए विवादों को जन्म दिया है, जिससे देश की राजनीति में हलचल मच गई है। उनके बयान यह दर्शाते हैं कि देश में धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर तीव्रता से बहस चल रही है, जो आने वाले समय में और भी गंभीर रूप ले सकती है।
