मन का कुरुक्षेत्र
शहर आज भी उतना ही व्यस्त था जितना हर रोज़— बस फर्क इतना था कि भीड़ को अपनी जल्दी थी, और मन को अपनी थकान, पर जब कैलेंडर ने धीरे से याद दिलाया कि “आज गीता जयंती है” तो लगा जैसे किसी ने दिमाग के ट्रैफिक सिग्नल पर एक पल के लिए ‘रेड’ लगा दिया हो और उसी ठहराव में कहीं भीतर से आवाज़ उठी—
“निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा…”
मूल श्लोक (अध्याय 15, श्लोक 5)
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ।।
जो आदमी नाम का बोझ अपने कंधों पर ईंट की तरह ढोता है— वह कभी हल्का नहीं चल पाता। कृष्ण कहते हैं—“मान छोड़ो, मैं मिलूँगा।”
जो हर बात में मोह का ग्लू लगाकर चल रहा है— रिश्तों से लेकर राजनीति तक— वह कभी मुक्त नहीं हो सकता।
कृष्ण कहते हैं—
“चिपकन हटाओ, सत्य दिखेगा।”
कुसंग किसे कहते हैं? वही जो आपकी आत्मा की बैटरी हमेशा लो रखे। जो मन को थकाए, जो विवेक को दबाए।
कृष्ण कहते हैं—
“संग बदला तो रंग बदला।” और सुख-दुःख? हमारे शहर में तो यह जोड़ी रास्ता पूछे बिना ही रोज़ आ जाती है— बिजली गई तो दुःख, वापस आई तो सुख, इसके बाद फिर वही चक्र।
कृष्ण कहते हैं—
“इनसे ऊपर उठो। तब मेरे धाम का रास्ता खुद साफ़ होगा।”
भोपालिया संदर्भ: हमारे शहर का कुरुक्षेत्र
हमारे शहर में हर गली में एक कुरुक्षेत्र छिपा पड़ा है—कहीं मोह के चक्कर में, कहीं मान के झटके में, कहीं मोबाइल की स्क्रीन से चिपकी चेतना में। गीता कहती है— “पहले अपने भीतर का अर्जुन ढूँढो, फिर बाहर वाले धृतराष्ट्र धीरे-धीरे अपने आप कमजोर पड़ने लगेंगे।”
गीता जयंती पर दूसरा श्लोक—जो शहर को आईना दिखाता है
अध्याय 4, श्लोक 7–8
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…
शहरनामा व्याख्या
जब शहर में धर्म कमज़ोर पड़ने लगता है और फाइलों में सच दम तोड़ देता है, जब सड़कों पर बेईमानी बिना पास के ऐसे घूमती है जैसे उसे कोई टोल-टैक्स भरने की जरूरत ही नहीं तब भगवान अवतार लेते हैं कहाँ?किसी पोस्टर में नहीं किसी चमत्कार में नहीं। वह आते हैं— भीतर की एक चुभन बनकर, एक निर्णय बनकर, एक ‘नहीं’ कहने की हिम्मत बनकर, एक ‘अब बस’ की आवाज़ बनकर कृष्ण का अवतार बाहर भी होता है पर उसका पहला कदम मन के भीतर पड़ता है।
शहरनामा की अंतिम चोट
आज गीता जयंती पर शहर फिर भाग लिया,
लोग भागते रहे— कोई प्रमोशन के पीछे, कोई प्रतिष्ठा के पीछे, कोई दिखावे के पीछे पर जो थोड़ी देर रुका, सांसें सुलझाईं, मन को साफ़ किया— उसी ने सुना,
कृष्ण कह रहे थे—
“मान छोड़ो, मोह छोड़ो, संग सुधारो—
बाकी रास्ता मैं दिखा दूँगा।”
शहर वही रहेगा पर तुम बदले, तो दृश्य बदल जाएगा।
इंद्रियों की गुलामी का शहर
सन्तुष्टः केन वा राजन् वर्तेतापि वारिणा।
औपस्थ्यजैह्व्यकार्पण्याद् गृहपालायते जनः।।
कभी-कभी लगता है हमारा शहर भी दो तरह के लोगों से बना है— एक वो, जो अपनी छोटी-सी दुनिया में शांत, संतुष्ट और निर्विघ्न चलते हैं और दूसरे वो, जो स्वाद और शौक की ऐसी पगडंडी पर दौड़ते हैं कि खुशी उनसे हाथ जोड़कर भी पीछा छुड़ा लेती है।
शास्त्र कहता है—
जो व्यक्ति भीतर से संतुष्ट है, वह केवल पानी पीकर भी अपने दिन को मुस्कुराहट के साथ पूरा कर सकता है। हमारे मोहल्ले के बुजुर्ग दद्दा को ही देख लीजिए—दो रोटियों और थोड़ी-सी दाल में इतना संतोष मानो स्वयं जीवन ने उन्हें आशीर्वाद दे दिया हो। उनका सुख उनके स्वाद में नहीं, उनके स्वभाव में बसता है। पर शहर का दूसरा हिस्सा.. वो लोग, जो जीभ और इंद्रियों के पीछे इस कदर भागते हैं कि खुद को अपनी ही इच्छाओं का घरेलू कुत्ता बना देते हैं। स्वाद की दूकानें, मोबाइल स्क्रीन पर तैरती इच्छाएँ और रात में चमकती लालच की रोशनियाँ— इन सबने मिलकर शहर को एक ऐसी जगह बना दिया है, जहां इंसान अपनी ही भूख का नौकर होता जा रहा है।
श्लोक की भाषा में कहें तो—
जीभ और जननेंद्रिय की गुलामी मनुष्य को इतनी दूर खींच ले जाती है, कि वह दूसरों के सामने झुकता है, दीन बनता है और कभी-कभी तो अपनी ही आत्मा के सामने शर्मिंदा भी।
कहानी सरल है, पर चुभती है— जो भीतर से संतुष्ट है, वह किसी का मोहताज नहीं; और जो अपनी इच्छाओं का दास है, उसे अपने ही शहर में पराया बनकर जीना पड़ता है। और हम सब अपने-अपने भीतर पूछें— हम दद्दा की तरह आत्म-संतुष्ट हैं या फिर शहर की चकाचौंध में भागते हुए अपनी ही इंद्रियों की रस्सी से बंधे हुए..?
यही शहरनामा का आज का सबक है—
सुख बाहर नहीं, अपने मन की लगाम भीतर है।
काम, क्रोध और लोभ : शहर के तीन अदृश्य गुंडे
श्रीभगवानुवाच —
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्।। (गीता 3.37)
शहर में जितने गुंडे, दलाल, रंगबाज़ और दबंग घूमते हों— उनमें से कोई भी इतना खतरनाक नहीं, जितने खतरनाक ये तीन अदृश्य गुंडे हैं: काम, क्रोध और लोभ।
भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“सावधान! यही तीन असली शत्रु हैं, जो हर आदमी को भीतर से खोखला कर देते हैं।”
काम : शहर की न खत्म होने वाली भूख
कभी ध्यान दिया है? शहर के हर चौक पर एक आवाज़ गूंजती है — “थोड़ा और चाहिए!” अच्छी नौकरी? अब उससे बेहतर वाली। अच्छा घर? अब उससे बड़ा घर।। अच्छा खाना? अब उससे महंगा खाना।
काम यानी अतृप्त इच्छा— एक ऐसी आग जो चाहे जितना डालो, बुझती नहीं। भगवान इसे ही कहते हैं—
महाशनः — जो सब कुछ खा जाता है।
क्रोध : जब भूख पूरी न हो
काम जब पूरी नहीं होती तो मन में धुआँ उठता है।
और वही धुआँ बनता है — क्रोध। ट्रैफिक में हॉर्न बजाता आदमी, ऑफिस में फाइल पटकता बाबू, बात-बात पर भड़कने वाला पड़ोसी— ये सब क्रोध के ही कल-कारखाने हैं।
कृष्ण कहते हैं—
क्रोध काम का ही दूसरा रूप है।
लोभ : मिला तो और चाहिए
जब इच्छा थोड़ी-सी पूरी हो जाती है,
तो शहर नई माँग लेकर खड़ा हो जाता है—
“अच्छा, अब यह मिला तो थोड़ा और…”
यही लोभ है —
जो आदमी को कभी नहीं रुकने देता।
और जब मन स्थिर नहीं होता,
तो जीवन पूरी तरह अस्थिर हो जाता है।
ये तीनों बाँधते कैसे हैं?
यही शहर का सबसे बड़ा धोखा है—
ये तीनों दिखाई नहीं देते,
पर मनुष्य को भीतर से जकड़ लेते हैं।
काम मन को खींचता है,
क्रोध उसे तोड़ता है,
लोभ उसे बेचैन रखता है।
भगवान कहते हैं—
“इन्हें अपना वैरी समझो।
ये अंदर बैठे हैं और तुम पर ही हमला करते हैं।”
शहरनामा का निष्कर्ष
सड़कों पर घूमते दंगाई कोई खतरा नहीं;
सबसे बड़ा खतरा मन के भीतर के ये तीन दंगाई हैं।
अगर इन्हें काबू कर लिया—
तो जीवन भी सुलझ जाएगा,
और मन भी शांत हो जाएगा।
कृष्ण की शिक्षा साफ है—
जिस दिन काम, क्रोध और लोभ पर विजय मिली,
उसी दिन शहर के भीतर का युद्ध जीत लिया।
हरे कृष्ण..
शुभ प्रभात
दासानुदास चेदीराज दास..
