नई दिल्ली। 6 दिसंबर 1992 – यह तारीख़ भारतीय राजनीति, समाज और इतिहास का ऐसा मोड़ लेकर आई जिसने आने वाले दशकों की दिशा बदल दी। अयोध्या में स्थित बाबरी मस्जिद का गिराया जाना केवल एक ढांचे का ध्वंस नहीं था, बल्कि देशभर में गहरे सामाजिक तनाव, लंबे कानूनी संघर्ष और कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव की शुरुआत भी था। इसी घटना से शुरू हुई 33 वर्षों की यात्रा का अंत 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के उद्घाटन के साथ हुआ।
6 दिसंबर 1992: वह दिन जिसने सब कुछ बदल दिया
सुबह करीब 10:30 बजे अयोध्या में लाखों कारसेवक जमा थे। भीड़ लगातार उग्र होती गई और नारेबाज़ी के बीच बाबरी मस्जिद की ओर बढ़ गई। सुरक्षा बलों को गोली न चलाने का आदेश था, जिससे स्थिति और बिगड़ गई। देखते ही देखते छह घंटे से कम समय में 460 साल पुरानी मस्जिद पूरी तरह ढह गई।
यह घटना अचानक उपजा गुस्सा नहीं थी; 1990 से ही राम जन्मभूमि आंदोलन चरम पर था। कई राजनीतिक दलों ने इस माहौल को हवा दी और अयोध्या धीरे-धीरे देशभर के भावनात्मक एवं राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया।
दंगे और तनाव: देश भर में आग
बाबरी विध्वंस के बाद भारत के अनेक शहरों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। सबसे अधिक प्रभावित हुआ मुंबई, जहां दिसंबर 1992 से जनवरी 1993 के बीच बड़े पैमाने पर दंगे हुए। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 900 से अधिक लोग मारे गए और हजारों घायल हुए। इन दंगों की भयावहता आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा है।
आतंकवाद की नई लहर और भारत–पाक संबंध
बाबरी विध्वंस के तुरंत बाद भारत–पाकिस्तान संबंधों में तनाव और बढ़ गया। पाकिस्तान में कई हिंदू मंदिरों पर हमले हुए, जबकि भारत में बड़े शहर आतंकियों के निशाने पर आ गए।
1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट, जिसमें 257 लोगों की मौत हुई, इस नए आतंकवादी दौर की शुरुआत थी। दाऊद इब्राहिम इसके बाद पाकिस्तान भाग गया और वहीं से अपना वैश्विक नेटवर्क संचालित करता रहा। 2001 संसद हमला, 2006 के बम धमाके, 26/11 मुंबई हमला, 2019 पुलवामा हमला -इन सभी घटनाओं में पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों की भूमिका सामने आई।
अयोध्या भी निशाने से नहीं बचा। जुलाई 2005 में छह आतंकियों ने अस्थायी राम मंदिर पर हमला किया, लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें मार गिराया।
लिब्रहान आयोग: 17 वर्षों की जांच
ध्वंस की जांच के लिए दिसंबर 1992 में लिब्रहान आयोग गठित किया गया था। तीन महीने में रिपोर्ट देने के लक्ष्य वाला आयोग अंततः 17 साल बाद, जून 2009 में रिपोर्ट सौंप सका। इसमें 400 से ज्यादा गवाहों से पूछताछ की गई, जिनमें कई बड़े राजनेता भी शामिल थे। रिपोर्ट पर विवाद हुआ, लेकिन किसी व्यक्ति को दोषी करार नहीं दिया गया।
न्यायालय का सफर: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया। यह निर्णय सभी पक्षों को स्वीकार्य नहीं था, और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि पूरी विवादित भूमि हिंदू पक्ष को मिलेगी। कोर्ट ने माना कि मुस्लिम पक्ष भूमि पर अपना विधिक अधिकार सिद्ध नहीं कर सका। साथ ही अदालत ने मुस्लिम समुदाय को अयोध्या में ही 5 एकड़ भूमि मस्जिद निर्माण के लिए देने का आदेश दिया।
22 जनवरी 2024: राम मंदिर का उद्घाटन
लगभग पांच शताब्दियों के विवाद और तीन दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समारोह के यजमान बने। देश-दुनिया के करोड़ों लोगों ने इस ऐतिहासिक पल को देखा। यह घटना भारतीय सामाजिक–धार्मिक परंपरा में एक नए अध्याय की शुरुआत थी।
33 वर्षों की यात्रा का सार
1992 से 1993 के बीच देश में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा
आतंकवाद का नया दौर, पाकिस्तान से बढ़ती कटुता
17 वर्षों की जांच, 27 वर्षों का न्यायिक संघर्ष
2019 का ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट फैसला
2024 में राम मंदिर का निर्माण
यह 33 साल सिर्फ़ एक धार्मिक स्थल का संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत की राजनीति, समाज, न्याय व्यवस्था और सांप्रदायिक संतुलन की एक गहरी परीक्षा थी।
