“पहले देश संविधान से नहीं, धर्म से चलता था” -मोहन भागवत
मोहन भागवत ने अपने संबोधन की शुरुआत इस सवाल से की कि जब संविधान अस्तित्व में नहीं था, तब देश का संचालन कैसे होता था? उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में शासन की नींव “धर्म” पर आधारित थी।
लेकिन यहां “धर्म” का अर्थ किसी धर्म-विशेष से नहीं था। इस संदर्भ में धर्म का अर्थ था-
कर्तव्य
नैतिकता
आचरण
और सामाजिक मर्यादा
भागवत ने स्पष्ट किया कि उस समय समाज का ढांचा परस्पर सहयोग, नैतिकता और सामूहिक उत्थान के सिद्धांतों पर खड़ा था। लोग पथभ्रष्ट नहीं होते थे क्योंकि धर्म का पालन केवल उपासना तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवनशैली से जुड़ा हुआ था।
धर्म-आधारित शासन की विशेषताएं
भागवत ने कहा कि धर्म-आधारित शासन में सत्ता का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि समाज की समृद्धि और उन्नति होता था। शासक स्वयं को समाज का रक्षक और सेवक मानकर काम करता था।
उन्होंने कहा कि-
“उस दौर में समाज स्वयं अपने आचरण से व्यवस्था को बनाए रखता था। शासन को चलाने के लिए किसी लिखित नियम की जरूरत बहुत कम होती थी।”
उनके अनुसार, धर्म की यह अवधारणा आज के “रिलिजन” की अवधारणा से पूरी तरह अलग है। यह व्यवहार, नीति और न्याय पर आधारित व्यवस्था थी।
कैसे उत्पन्न हुआ राजा और शासन का ढांचा?
अपने भाषण में मोहन भागवत ने यह भी बताया कि समय के साथ समाज बदलता गया और कुछ चुनौतियाँ सामने आईं। जनसंख्या, आवश्यकताओं और समस्याओं में वृद्धि हुई, जिससे एक केंद्रीय नेतृत्व की जरूरत महसूस होने लगी।
उन्होंने कहा-
“परिस्थितियाँ बदलीं, और लोगों को लगा कि समाज को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो सामूहिक हितों का ध्यान रखे। इसी आवश्यकता के कारण ‘राजा’ की अवधारणा का जन्म हुआ।”
राजा आने के बाद शासन संचालन को सुचारू रखने के लिए नियम-कानून की आवश्यकता पड़ी। यहीं से विधि व्यवस्था का प्रारंभ हुआ।
लिखित नियमों का संग्रह ही संविधान बना
मोहन भागवत ने आगे कहा कि जब समाज जटिल हुआ, तब नियम बनाना जरूरी हो गया। विभिन्न परंपराएँ, न्यायिक सिद्धांत, सामाजिक व्यवहार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का एक साथ संकलन ही समय के साथ “संविधान” का रूप बना।
उन्होंने कहा कि आज देश संविधान के आधार पर चलता है और यह जरूरी भी है, क्योंकि-
संविधान नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है,
शासन व्यवस्था को पारदर्शी बनाता है,
किसी भी वर्ग के हितों की अनदेखी होने से रोकता है,
और शासन को जवाबदेह बनाता है।
भागवत के अनुसार, संविधान इसलिए जरूरी है क्योंकि अब समाज पहले जैसा सरल और आत्मनियमित नहीं रहा। विविधता, जटिलता और आधुनिक प्रशासनिक संरचना को देखते हुए एक लिखित ढांचे की जरूरत पड़ी।
धर्म और संविधान-दोनों की भूमिका अलग, लेकिन उद्देश्य एक
RSS प्रमुख ने कहा कि धर्म और संविधान दोनों का उद्देश्य समाज में संतुलन और न्याय स्थापित करना है।
धर्म यह कार्य नैतिकता और आचरण के माध्यम से करता था।
संविधान यह कार्य विधि, प्रावधान और संस्थागत व्यवस्था के माध्यम से करता है।
उन्होंने कहा-
“संविधान यह सुनिश्चित करता है कि शासन में किसी भी व्यक्ति या वर्ग के साथ अन्याय न हो। इसी उद्देश्य से इसे बनाया गया, और इसी के आधार पर आज देश चलता है।”
समापन
पानीपत में दिया गया मोहन भागवत का यह भाषण देश की प्राचीन परंपराओं और आधुनिक शासन व्यवस्था के बीच संबंध को समझाने का एक प्रयास था। उन्होंने बताया कि जहां प्राचीन भारत में धर्म समाज की मार्गदर्शक शक्ति था, वहीं आज संविधान वह आधार है जिस पर देश की संस्थाएँ और व्यवस्था टिकी हुई हैं।
संविधान के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें, ताकि देश का संचालन सुचारू और न्यायसंगत बना रहे।
