
रो पड़ा ख़ुद भी खुदा…
रो पड़ा ख़ुद भी खुदा ये देखकर l
बेखबर था आदमी का ये शहर ll
आज भी तो घोर काली रात है l
कौन कहता हो गई है अब सहर ll
क्या खुदा भी अब सितमगर बना गया l
सो गया मुँह चादरों से ढाँककर ll
व्यर्थ है बातें करोड़ों लाख की l
एक कपड़ा भी नहीं जब देह पर ll
हैं अगर पिछले जनम के कर्म ये l
सो रहे पापी सभी क्यों सेज पर ll
वोटरों में बँट गए कम्बल सभी l
छोड़ क्यों इनको दिया दुर्भाग्य पर ll
मिल न पाये उम्र भर कपड़े जिन्हें l
शान से फिर आखिरी होगा सफर ll
रोज ही गुजरे यहाँ से काफिला l
क्यों नहीं उनकी पड़ी इनपर नजर ll
मौत को भी अब शरम आने लगी l
हाल ऐसा जिंदगी का देखकर ll
फर्क कुछ पड़ता नहीं उनको अनिल l
पाँच सालों तक नहीं उनको फिकर ll
डॉ अनिल कुमार बाजपेई काव्यांश,
जबलपुर मध्यप्रदेश
