
भारतीय चिंतन की मान्यता है कि सृष्टि के कण-कण में परमतत्व व्याप्त है ’’सर्व खल्विदं ब्रम्ह’’ यह सिद्धान्त भी निगमएवं आगम उपासना का प्रवर्तक है। उपासना चरम परिणिति में सर्वत्र एकत्व आभाषित होती है जो अद्वैतसिद्धि का स्वरूप है। संतशिरोमणि तुलसीदास ने लिखा है कि ’’सियाराममय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरि जुग पानी ।। उक्त भाव को अभिव्यक्त किया है। उनके कहे अनुसार सृष्टि के कण-कण में परमतत्व व्याप्त है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि यंत्र और देवता एक ही है और कहा गया है कि-यंत्र मंत्रमयं प्रोक्तं मंत्रात्मा देवतैव हि।देहात्मनोर्हथा भेदो यंत्र देवतयोस्तथा।।
श्रीयंत्र के विषय में लोगों की धारणा श्री का अर्थ, लक्ष्मी प्राप्ति वि़द्या है, जिससे लक्ष्मी की प्राप्ति की साधना करना है। श्रीयंत्र के साथ श्री शब्द होने से इसके प्रति साधकों की उत्सुकता स्वाभाविक है परन्तु आध्यात्म कहता है कि सिर्फ धन प्राप्ति के लिये श्रीयंत्र की साधना करना वैसा ही है जैसे किसी चक्रवती सम्राट से एकमुठ्ठी धान मॉगना। श्रीयंत्र की साधना ब्रम्हविद्या का रूप मानी है जो शक्तिदर्शन की रहस्यात्मक विद्या है इसके शास्त्रीय रूप को जानने के लिये साधक की भूमिका विचारणीय है। मानव चिंतनशील स्वभाव का प्राणी है, इसी प्रवृत्ति के कारण उसे बौद्धिकता की प्रथम अनुभूति में सृष्टि एवं उससे जुड़े तथ्यों के प्रति विविध जिज्ञासायें होती है जिसके पूर्ण होने पर वह यंत्रों के दिव्यता से असीम शक्ति एवं साम्राज्य पा सकता है किन्तु सब कुछ जानने समझने के बाद अगर वह यंत्र के तत्वज्ञान से अनभिज्ञ बना रह यंत्रों की शक्तियों को जागृत कर स्वयं चक्रवती बनने से चूके तो यह उसी प्रकार की सुसुप्ति होगी जहॉ उसकी जिज्ञासायें मृगमरीचिका बन जगत क्या है? इस जगत की उत्पत्ति कैसे हुई ? मैं कौन हॅू ? कहॉ से आया हॅू ? कहॉ जाऊॅगा? आदि प्रश्नों के द्वन्द को मन में रखे अपनी खुमारी को नहीं तोड़ता है।
यंत्र का तात्पर्य-
सम्पूर्ण सृष्टि में जो है, वह सूक्ष्म अथवा प्रतीक रूप में यंत्र में समाहित है। श्रीविद्वा की अधिष्ठात्री देवी श्रीललिता महात्रिपुरसुन्दरी कहीं है जो पन्चकृत्य – सृष्टि, स्थिति, संहार, निग्रह एवं अनुग्रह परायणा है। श्रीविद्या या अन्य देवी-देवताओं के यंत्रों में वास करने के कारण ’’यंत्र’’ परतत्व विश्वमय शिव-शिवा का विग्रह है, जिनकी शक्तियों को आभासित कर जिस देवी देवता के यंत्र विग्रह की कृपा से आकांक्षाओं को पूरा किया जा सकता अगर वह इस मार्ग को चयन करने की बजह यंत्र रूपी शब्द ब्रम्ह से परब्रम्ह की प्राप्ति से चूक जाये तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। यंत्र साधना के लिये साधक परम्परागत गुरूओं से ( परमेष्ठी,गुरू, परमगुरू एवं गुरू) दीक्षा लेने पर इन साधनाओं का अधिकारी बन सिद्धी प्राप्त कर सकता है, अतएव ग्रहस्थ भी यह सहज,सरल साधना का लाभ लेकर अपने घर को श्रीसमृद्धि,सम्पन्न,वैभव एवं आरोग्य के विपुल भण्डार से भरकर आनन्दित रह सकता है।
’’यंत्र’’ है देवी-देवताआं की देवनगरी-
तंत्रशास्त्रों के अनुसार पंचदेव उपासना में विष्णु, शिवशक्ति, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, महालक्ष्मी कुबेर आदि सभी देवी-देवताओं व सूर्य, शनि, आदि ग्रहों की शांति एवं कृपा प्राप्ति हेतु इनके यंत्र बनाकर पूजन किया जाता है एवं मंदिरों में भी इनकी प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। इसीलिये यंत्रों का एक नाम देवनगर भी है। देवनागरी लिपि में देवों का निवास है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक अक्षर में देव ही नहीं अपितु देवों के अधिदेव, प्रत्यधिदेव, परिकर आदि का निवास होता है। अस्तु यंत्र मंत्ररूप है,मंत्र देवताओं का ही विग्रह है, जिस प्रकार शरीर आत्मा में कोई भेद नहीं उसी प्रकार यंत्र और देवता में भी कोई भेद नहीं माना गया है।
मनुष्य ही नहीं सामान्य जीव भी अपना घर बनाकर निवास करते है, इसी क्रम में यंत्र भी देवताओं का आवासगृह है, यह आवासगृह किसी अभेद किले से कम नहीं है, इस मजबूत किले में यंत्र के प्रधान अधिष्ठाता देव अपने-अपने स्थानों की सुरक्षा हेतु आवासगृह स्थान की सभी दिशा, कोण मण्डल आदि के सुरक्षाधिकारी के रूप में अधिपतियों को नियुक्त करते है जो पूजा में आमंत्रित किये जाने पर पूजा पाकर यंत्र के प्रत्येक कोण में विराजित देव परिवार साधक की सुरक्षा एवं कार्यसिद्ध करता है।देवताओं का आवासगृह होने के कारण यंत्र समस्त सिद्धियों का द्वार, सृष्टि का मूल, ज्ञान-विज्ञान का केन्द्रस्थल, उपासना का एकमात्र आधार कहा है जिससे यंत्रसिद्धि से सर्वसिद्धिया सुलभ होती है।
मनुष्य सुख का आकांक्षी है और सारे प्रपंच सुख प्राप्ति की कामना के लिये किये जाते है। एक ओर बनावटी कृतिम सुख है तो दूसरी ओर मौलिक अकृतिम सुख हैं, कृतिम सुख काम और भोग की प्राप्ति की दौड है जबकि अकृतिम सुख मोक्षप्राप्ति है। कामभोग के लिये अर्थ आवश्यक है तो अर्थ प्राप्ति के लिये धर्म महत्वपूर्ण है। धर्म से ही अर्थ-काम की प्राप्ति हो तो मोक्ष प्राप्त होगा अतः यह प्रमाणित है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरूषार्थ है जिनसे अकृतिम सुख मिलेगा और इसी की घोषणा महामुनि महर्षि ब्यास इन चारांं पुरूषार्थों का मूल धर्म मानते हुये कहते है कि-’’धर्मा दर्शस्च्श्र कामच्श्रः’’अर्थात धर्म से ही अर्थ और अर्थ से ही काम की प्राप्ति होगी। धर्म के लिये धर्माचरण आवश्यक है और धर्माचरण के लिये तंत्रशास्त्रों में कहा गया है कि-अथातो दीक्षानां व्याख्यामस्थामः’’ अर्थात धर्माचरण करने के लिये अधिकारी बनो। भारतीय आचार्य परम्परा में वेद और तंत्र दोनों प्रमाण भूत है। वेदान्त में यंत्र विद्या का विस्तृत विवरण मिलता है।
यंत्र का प्रार्दभाव-
यंत्र का तात्पर्य देवता को यंत्रित करना या समावेश करना है। श्रीचक्र्रं शिवयोर्वपुः अर्थात श्रीयंत्र शिव शिवा का विग्रह है। एको ज्योतिरभूत द्विधा सृष्टि के आरम्भ में एक प्रकाशस्वरूप ज्योति दो ही रूपों में प्रज्वल्वित हुई जिससे स्फुरण परमशक्ति से सर्वप्रथम श्रीयंत्र का आर्विभाव हुआ। सौर्न्दयलहरी में जगदगुरू शंकराचार्य का कथन है कि ब्रम्हा, विष्णु और शिव ने श्रीविद्या की उपासना की थी और श्रीविद्या का स्थूल शरीर श्रीचक्र है जिसमें महात्रिपुरसुन्दरी का निवास है, इसलिये चक्र ब्रम्हाण्ड का प्रतीक है। श्री चक्र में चार शिवकोण और पॉच शक्तिकोण होते है।बिन्दु, त्रिकोण, अष्ठकोण, अन्तर्दशारबहिर्दशार, चतुर्दशार, अष्ठदल,षोडसदल, वृत्तत्रय, भुपूर इन नवयोन्मात्मक समस्त ब्रम्हाण्ड का नियामक रेखात्मक श्रीयंत्र का प्रार्दुभाव हुआ। सर्वप्रथम बिन्दु के तीन रूप हुये, धर्म- अधर्म, चार आत्मा मातृमेय और प्रमा, ये तीन इस प्रकार नौ हुये। त्रिकोण और अष्ठकोण यही नवमोन्यात्मक श्रीचक्र है,शेष सभी कोणों और दलों को इसी नवयोनियों में समाहित किया गया है।
श्रीचक्र यंत्र है ब्रम्हाण्ड का प्रतीक-’
सौन्दर्यलहरी के भाष्यकार केवल्य शर्मा के मतानुसार श्रीचक्र मनुष्य देह का प्रतीक है जिसमें मनुष्य देह का माप अपनी अंगुलियों के नाम से 96 अंगुल प्रमाण होता है इसलिये श्री चक्र का माभी 96 ईकाईयों पर रखा गया हैं। श्रीचक्र यंत्र बनाने का वर्णन में चार श्रीकंठ और पॉच शिवयुवतिॅया, इन 9 मूल प्रकृतियों के रहने से 43 कोण बनते है, जो शंभु के विन्दुस्थान से भिन्न है तथा तीन वृत्तों और तीन रेखाओं सहित 8 और 16 दलों से युक्त है। तैत्तिरीयारण में कहा गया है कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता से कुण्डलिनी जगा करके सहस्त्रार में शक्ति को प्राप्त किया था। इससे स्पष्ट होता है कि यह वैदिक मार्ग है । श्रीचक्र ब्रम्हाण्ड और पिण्ड दोनों का प्रतीक है इसकी रचना में 4 श्रीकंठ अर्थात शिव त्रिकोण और 5 शिवयुवति अर्थात शक्ति त्रिकोणों के योग से होती है। शिव और शक्ति त्रिकोणों का मुख्य एक दूसरे के विपरीत रहता है जैसे सृष्टिक्रम में 5 शक्ति त्रिकोण उर्ध्द्धमुख रखे जाते है। प्रथम केन्द्रीय त्रिकोण को जिसके केन्द्र में शंभु का स्थान है, छोड कर शेष त्रिकोणें की सॅख्या 42 है। प्रथम मध्य त्रिकोण के बाहर चारों ओर दूसरे नम्बर पर 8 कोण बनते है, उसको अष्टकोण कहते है, फिर तीसरे और चौथे स्तर पर दस 2 कोण बनते है उन्हें अन्तर्दशार और बहिर्दशार कहते है, उनके ऊपर 14 को बनते है, उनको चतुर्दशार कहते है। सबका योग एक-आठ-दस-दस-चौदह बराबर 43 होता है। मध्य केन्द्रीय विन्दु शंभु का स्थान है जो प्रकृति स्वरूप 9 त्रिकोणों के योग से रचित पूरे चक्र से पृथक है। उक्त 43 कोणों के चक्र के बाहर प्रथम वृत्त पर अष्ट दल पद्य और उसके बाहर दूसरे वृत्त पर षोडसदलपद्य़ तीन वृत्तों से घिरा है। सबके बाहर तीन रेखओं का चतुष्काण है, जिसे भूगह कहते है। भूग्रह की चारो भुजायें बराबर है और चारों दिशाओं में 4 द्वार होते है जिसके 12 विभाग के अनुपात से 96 समविभाग बनते है। एक चतुष्कोण के भीतर एक एक विभाग छोडकर दो वैसे ही सम चतुष्कोण बनाये जाते है, इन तीन चतुष्कोणोंं का भृगुह नामक ़त्रेलोक्य मोहनचक्र नाम दिया गया हैं।
श्रीचक्र के इन 9 विभागों की शक्तियॉ सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड को नियंत्रित करती है जिसकी विलक्षण महिमा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नवधा प्रकृति का वर्णन में देखी जा सकती है जिसमें एक जीव भूता परा प्रकृति और अष्टवॉ अपरा प्रकृति, जहॉ आकाशदि से 5 तंन्मात्रा और मन, बुद्धि, अहंकार से समष्टि अहंकार , महत्व और अव्यक्त क्रंमशः समझना चाहिये देखिये- गीता-भूमिरापोड्नलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतींय मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा।।अध्याय-7 श्लोक-4– अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार ये आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्न अपर प्रकृतियॉ है। ये आठों भौतिक शक्तियॉ जिसमें प्रथम पॉच पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश स्थूल अथवा विराट सृष्टियॉ है है जिनमें पॉच इन्द्रियविषय शब्द,स्पर्श,रूप,रस तथा गंध सम्मिलित है। तीन अन्य तत्वों में मन,बुद्धि और अहंकार है, जिन्हें अल्पज्ञान के कारण भौतिकवादी उपेक्षित रखते है, दार्शनिक मानसिक कार्यकलापों से संबंध रखते है जबकि पूर्णज्ञानी परमात्मा कृष्ण को ही जानते है। गीता के सातवे अध्याय के 5 वे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते है-’’अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेंदं धार्यते जगत्।। अर्थात हे महाबाहु अर्जन इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है जो उन जीवों से युक्त है जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं। भौतिक प्रकृति के ये दोनों रूप-स्थूल पृथ्वी आदि तथा सूक्ष्म मन आदि अपरा शक्ति के ही प्रतिफल है और जीव जो अपने विभिन्न कार्यो के लिये अपरा शक्तियों का विदोहन करता रहता है, स्वयं परमेश्वर की परा शक्ति है और यह वहीं शक्ति है जिसके कारण संसार कार्यशील है। अनेक अलौकिक विलक्षण चमत्कारों से परिपूर्ण श्रीचक्र से 98 शक्तियों का अर्चन होता है और जो विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कर प्रतिदिन इसे पूजते है वे महान फल प्राप्त करते है।
यंत्र का तात्विक अर्थ-
’’यंत्र’’ शब्द ’’यम्’’ धातु से बना है। इस धातु के अर्थ क्रंमशः विपरीत, परिवेषन और वेष्टन आदि होते है। ’’यच्छति अत्रेति यंत्रम्’’ या ’’यमयति अत्रेत्रि यंत्रम्’’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार यम धातु से उणादिसूत्र ’’गृधृपचिवचियमिसदिक्षदिभस्त्रः के द्वारा ’’त्र ’’प्रत्यय होने से ’’यंत्र’’ शब्द सिद्ध होता है। आगमानुसार ’यच्छति त्रायते चेति यंत्रम!’’ अर्थात यमन और त्राणरूप दो धातुओं से बने इस शब्द का भावार्थ जो व्यक्ति अपनी चेष्टाओं को नियंत्रित करके आकार विशेष में अपने ईष्ट की अर्चना भावना करता है उसका त्राण रक्षा करने वाला। यंत्र में शक्तियों का नियंत्रण माना है जिसमें साधक अपनी साधनाबल से यथेष्ठ ऊर्जा प्राप्त कर सकता है। नारदपुराण में कहा गया है कि- ’’आपोग्निहृंदयम चक्रं विष्णोः क्षेत्र-समुद्रभवम्। यंत्रच्य प्रतिमास्थानमर्चने सर्वदा हरे।।’’ तात्पर्य जल, अग्नि, हृदय, चक्र, विष्णु के क्षेत्र में उत्पन्न वस्तु और यंत्र ये सब भगवान विष्णु की प्रतिमा के समान पूजन के स्थान है।आज के व्यस्त जीवन में अनेक समस्याओं से घिरे हुये मानव के लिये ’यंत्र साधना’’ उत्तम सहायक बनकर उसकी कठिनाईयों को दूर करने तथा सभी अपेक्षा और आकांक्षा की पूर्ति में सफल मानी गयी है। यंत्र साधना एक सरल, सुलभ और उत्तम मार्ग है जिसकी विधिवत साधना करने से सभी प्रकार के सिद्धि के मार्ग खुल जाते है। कहा गया है कि-सर्वासामेव सिद्धिनां यंत्रसाधननमुत्तमम्। द्वारं शास्त्रेषु सम्प्रोक्तं तस्मात् तत् परिशील्यताम्।।
यंत्रों की रचना का शुभारम्भ
’’बिन्दु’’ से हुआ है और हमारी वर्णमाला के सभी अक्षर ’यंत्र’ ही है। बिन्दु शब्द की रचना में तीन धातुओं का एकीकरण माना गया है। अर्थात व्याकरण में ’’विद’’ धातु का पहला अर्थ सत्तावाचक है अतः उससे बनाये गये बिन्दु शब्द का अर्थ सत्ता होगा। दूसरा अर्थ ज्ञान और तीसरा अर्थ लाभ है। विद् सत्तायां, विद् ज्ञाने, विद् लाभे, इन तीनों धातुओं से निष्पन्न बिन्दु का अर्थ क्रंमशः इच्छा, ज्ञान और क्रिया का सूचक है और ये ही तीन बिन्दु मिलकर त्रिकोण बनाते है। भारतीय दर्शन मे शून्यबिन्दु को बड़ा महत्व दिया गया है। शून्यबिन्दु से सृष्टि और सृष्टिविस्तार होकर पुनः शून्य में सृष्टि का विलय हो जाना शून्यतत्व को दर्शाता है, अतः शून्य ही पूर्ण है। इसी शून्य की पूर्णता का प्रतीक में कहा गया है कि-पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। अर्थात बिन्दुरूपी यंत्र से प्राकृतिक वस्तुओं की रचना हुई है , पेड़ पौधों में फूटते अंकुर, पुष्प, फल आदि प्रकट होकर पूर्णता के तत्व को पुष्ट कर रहे है, ये सभी यंत्र स्वरूप है।
यंत्रों के दस अंग कहे गये है जिसमें बीज, प्राण, शक्ति, दृष्टि, वश्यादि, मंत्र, यंत्रगायत्री, प्राणस्थापन, भूतबीज, तथा दिकपाल बीज, देखिये-’’बीजं प्राणं च शक्तिं च दृष्टि वश्यादिकं तथा। मंत्र यंत्राख्यगायत्री प्राणस्थापनमेव च।।’’ शास्त्रों में यंत्रों की आकृति पूजा का विधान बतलाया गया है जिसमें पॉच प्रकार की आकृतियों के स्वरूप मिलते हैं जिसमें भूपृष्ठ, मेरूपृष्ठ, पाताल, मेरूप्रस्तार और कूर्मपृष्ठ है। भूपृष्ठ का तात्पर्य समतल आकार वाली वस्तु पर यंत्र की आकृति को उत्कीर्ण करना है जिसमें रेखा, वर्ण, मंत्र बीज को यंत्राधार पर उभरे हुये अंकित करना अथवा खुदी हुई उत्कीर्ण करना। मेरूपृष्ठ में आकृति वस्तु के आधार पर मेरू की तरह ऊॅचाई की ओर पर्वताकार उठी हुई बनाई जाती है जिसमें अंतिम भाग नुकीला और शिखर पर हो, नीचे का र्हिस्सा चौड़ा होता है जो बीच में छोटा होते जाता है इसमें रेखा उभरी हुई या उत्कीर्ण हो सकती है।
हमारे ऋषियों-मनीषियों ने कठोर साधना के पश्चात अपने इष्टदेव की कृपा से स्वयं में खोयी हुई शक्ति को जगाने के लिये यंत्रों की आराधना की है। सनातन काल से सभी धर्म और सम्प्रदाय यंत्र की शक्ति का प्रयोग कर सुख-समृद्धि प्राप्त करते आये है। यंत्रलेखन विधि में बीजमंत्रों में अंकों का प्रयोग कर अंकयंत्रों का निर्माण चार प्रकार से किया जाकर अंकात्मक नौ शक्तिया की उपासना की जाती है जिसमें श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, गणेशयंत्र, भैरव यंत्र, सूर्ययंत्र, शनि यंत्र, नवग्रहादि यंत्र सहित दश महाविद्याओं के यंत्र मे ंकाली मंत्र, भैरवी यंत्र, तारा यंत्र, षोडसी यंत्र, भुवनेश्वरी यंत्र, भैरवी यंत्र, मातंगी यंत्र, छिन्नमस्तिका यंत्र, कमला महालक्ष्मीयंत्र आदि विभिन्न देवी-देवताओं के यंत्रों की पूजा एवं उपासना का विधान है जिसे सामान्य मनुष्य भी अपने व्यस्ततम समय में समय निकालकर इन यंत्रों की महाशक्ति की पूजा-आराधना से मनोवांछित फल प्राप्त कर सकता हैं। यंत्र भारतीय वाकड्मय का सबसे पहला तत्व है जिसके आधार पर इच्छा,ज्ञान और क्रियाशक्ति के रूप में अंकों के स्वरूप में देवी-देवताओं के त्रिकोणात्मक-चौकोर स्वरूप से अपने जीवन में विकास के महालक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली नर्मदापुरम
मोबाईल 9993376616
