नई दिल्ली । अरावली पर्वतमाला की परिभाषा में बदलाव कर बड़े पैमाने पर खनन की अनुमति दिए जाने से जुड़ी खबरों को केंद्र सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि न तो अरावली की परिभाषा कमजोर की गई है और न ही 100 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में खनन को खुली छूट दी गई है। बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित एक मानकीकृत परिभाषा के जरिए अरावली क्षेत्र को पहले से अधिक मजबूत सुरक्षा प्रदान की गई है। केंद्र सरकार ने यह सफाई उन रिपोर्ट्स के बाद दी जिनमें दावा किया गया था कि अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा के चलते खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस प्रतिबंध का हवाला दिया जिसके तहत अरावली पर्वतीय क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर रोक लगी हुई है। यह रोक तब तक जारी रहेगी जब तक एक व्यापक और वैज्ञानिक प्रबंधन योजना को अंतिम रूप नहीं दिया जाता। केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सुंदरबन बाघ अभयारण्य में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित परिभाषा के लागू होने से अरावली क्षेत्र का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संरक्षित क्षेत्र के दायरे में आ जाएगा।
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को कमजोर करना नहीं बल्कि कानूनी अस्पष्टताओं को दूर कर अरावली की प्रभावी रक्षा सुनिश्चित करना है।दरअसल 100 मीटर के मापदंड को लेकर पैदा हुए विवाद के बीच सरकार ने स्पष्ट किया कि यह परिभाषा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर सभी संबंधित राज्यों में एकरूपता लाने के लिए तैयार की गई है। इसका मकसद उन खामियों को खत्म करना है जिनका फायदा उठाकर पहाड़ियों के आधार के बेहद करीब खनन जारी रखा जाता था। पर्यावरण मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों की सुनवाई के दौरान मई 2024 में एक समिति के गठन का निर्देश दिया था।
इस समिति का काम अरावली पहाड़ियों और पर्वत श्रृंखलाओं की एक ‘समान और स्पष्ट परिभाषा’ सुझाना था। समिति की अध्यक्षता पर्यावरण मंत्रालय के सचिव ने की जबकि इसमें राजस्थान हरियाणा गुजरात और दिल्ली के प्रतिनिधियों के साथ-साथ तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञ भी शामिल थे। समिति ने अपनी जांच में पाया कि चारों राज्यों में अरावली की परिभाषा को लेकर अलग-अलग मानक अपनाए जा रहे थे। केवल राजस्थान में ही वर्ष 2006 से एक औपचारिक और स्पष्ट परिभाषा लागू थी। अंततः समिति ने राजस्थान की उसी परिभाषा को आधार बनाकर सभी राज्यों में लागू करने की सिफारिश की जिस पर सभी राज्य सहमत हो गए।
इस परिभाषा के अनुसार स्थानीय भू-भाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली भू-आकृतियों को पहाड़ी माना जाएगा। इसके साथ ही ऐसी पहाड़ियों को घेरने वाली सबसे निचली सीमा रेखा के भीतर खनन पूरी तरह निषिद्ध रहेगा भले ही उस सीमा के भीतर मौजूद भू-आकृतियों की ऊंचाई या ढलान कुछ भी हो। सरकार ने यह भी साफ किया कि 100 मीटर से नीचे की सभी भू-आकृतियों को खनन के लिए खुला मानना पूरी तरह गलत निष्कर्ष है। यह प्रतिबंध केवल पहाड़ी के शिखर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी पहाड़ी प्रणाली और उसके भीतर आने वाले सभी क्षेत्रों पर लागू होता है।
इसके अलावा परिभाषा को और पारदर्शी बनाने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़े गए हैं। इनमें 500 मीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ियों को एक ही पर्वत श्रृंखला मानना खनन से पहले भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मानचित्रों पर अनिवार्य मैपिंग और खनन निषिद्ध मुख्य व संरक्षित क्षेत्रों की स्पष्ट पहचान शामिल है। सरकार ने दोहराया कि अरावली की परिभाषा में बदलाव को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम तथ्यात्मक रूप से गलत है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 20 नवंबर 2025 को इन सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के बाद अरावली पर्वतमाला की कानूनी सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।