श्रीलीला ने 21 साल की उम्र में दो दिव्यांग बच्चों, गुरु और शोभिता को गोद लिया था। इसके बाद वर्ष 2025 में उन्होंने एक और बच्ची को अपनाया। तीनों बच्चों को फिलहाल आश्रम में रखा गया है ताकि उनकी देखभाल स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्थित ढंग से हो सके। अभिनेत्री नियमित रूप से बच्चों से फोन पर बात करती हैं और समय-समय पर उनसे मिलने भी जाती हैं। उनका कहना है कि बच्चों के सुरक्षित विकास को प्राथमिकता देना उनकी जिम्मेदारी का सबसे अहम हिस्सा है।हाल ही में दिए गए इंटरव्यू में श्रीलीला ने बताया कि व्यस्त पेशेवर जीवन और पालन-पोषण की जिम्मेदारियों के चलते उन्हें बच्चों को अपने साथ रखना फिलहाल संभव नहीं है। उन्होंने कहा मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि बच्चों को सुरक्षित और संरक्षित माहौल मिले। उनकी पढ़ाई स्वास्थ्य और खुशहाली मेरी सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका यह कदम बच्चों के भले के लिए है और वह हमेशा उनके जीवन में सक्रिय रूप से जुड़े रहेंगे।
श्रीलीला की यह कहानी बॉलीवुड और साउथ फिल्म इंडस्ट्री में उन अभिनेत्रियों की कतार में शामिल है जिन्होंने शादी से पहले मातृत्व अपनाया। रवीना टंडन ने 21 साल की उम्र में और सुष्मिता सेन ने 24 साल की उम्र में बच्चे गोद लिए थे। इसी तरह श्रीलीला ने भी समाज और इंडस्ट्री में बिन ब्याही मां के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है।सोशल मीडिया और इंडस्ट्री में उनके इस निर्णय को लेकर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। कई लोग उनके कदम की सराहना कर रहे हैं और इसे जिम्मेदार मातृत्व का उदाहरण मान रहे हैं। वहीं कुछ लोग युवा उम्र में मातृत्व के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए श्रीलीला ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा और उनका बेहतर भविष्य उनके फैसले की मुख्य वजह है।
भविष्य में श्रीलीला ने यह भी कहा कि वह बच्चों के साथ अधिक समय बिताने, उनकी शिक्षा और विकास पर विशेष ध्यान देने की कोशिश करेंगी। फिलहाल आश्रम में रहना उनके लिए सबसे उपयुक्त विकल्प है ताकि बच्चे सुरक्षित और संरक्षित वातावरण में बड़े हों। अभिनेत्री लगातार बच्चों के पालन-पोषण में सक्रिय हैं और उनके जीवन में जिम्मेदारी और प्रेम दोनों बनाए रख रही हैं।श्रीलीला की कहानी न केवल युवा माताओं के लिए प्रेरणा है बल्कि यह दिखाती है कि मातृत्व में जिम्मेदारी, सुरक्षा और शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। छोटे से छोटे बच्चे हों या तीनों गोद लिए गए हों, उनका पालन-पोषण और खुशहाली ही किसी भी मातृत्व निर्णय की सच्ची कसौटी होती है।
