फिल्म के निर्माताओं ने राधे के मानसिक और भावनात्मक बिखराव को पर्दे पर उतारने के लिए हैदराबाद के मशहूर गोलकोंडा किले का चुनाव किया था। यह चुनाव फिल्म की कहानी को वह गहराई देने के लिए किया गया था जिसे कोई बनावटी सेट नहीं दे सकता था। गोलकोंडा किले के पुराने और वीरान हिस्सों, उसकी ऊंची पत्थर की दीवारों और भारी भरकम लोहे के दरवाजों ने फिल्म को वह यथार्थवादी माहौल दिया जो एक पुराने और सख्त मानसिक संस्थान के लिए जरूरी था। किले के भीतर की अंधेरी गलियों ने राधे के किरदार की तड़प और उसके अकेलेपन को और अधिक प्रभावशाली बना दिया। यही कारण है कि जब दर्शक पर्दे पर सलमान खान को जंजीरों में बंधा देखते हैं तो वह दृश्य सीधे दिल पर चोट करता है।
गोलकोंडा किला सदियों से अपनी भव्यता के लिए जाना जाता रहा है लेकिन ‘तेरे नाम’ की टीम ने इसकी ऐतिहासिकता का उपयोग एक अलग ही संवेदना को दर्शाने के लिए किया। फिल्म की शूटिंग के दौरान किले के शांत और खाली कोनों को इस तरह सजाया गया कि वह एक ऐसा स्थान प्रतीत हो जहाँ समय ठहर गया हो। राधे के किरदार में सलमान खान की बेहतरीन अदाकारी को इन लोकेशन्स ने एक अलग ही स्तर पर पहुँचा दिया। फिल्म के समीक्षक भी मानते हैं कि लोकेशन और एक्टिंग के इसी तालमेल ने ‘तेरे नाम’ को एक क्लासिक का दर्जा दिलाया है।
आज भी जब दर्शक इस फिल्म को दोबारा देखते हैं तो श्रीपुरधाम आश्रम के दृश्यों में गोलकोंडा किले की पुरानी वास्तुकला की झलक साफ देखी जा सकती है। यह फिल्म निर्माण की उस खूबसूरती को दर्शाता है जहाँ एक ऐतिहासिक धरोहर ने एक काल्पनिक कहानी को इतना वास्तविक बना दिया कि लोग उसे सच मान बैठे। यह जानकारी न केवल फिल्म निर्माण की तकनीक को समझने वालों के लिए दिलचस्प है बल्कि उन करोड़ों फैंस के लिए भी खास है जो आज भी ‘राधे’ के दर्द को अपना मानते हैं। गोलकोंडा किले की उन दीवारों ने राधे के जज्बातों को जिस तरह समेटा वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक अमिट अध्याय बन गया है।
