इस लिस्ट की शुरुआत होती है ‘आर्गो’ से, जो 1979 के ईरान संकट के दौरान छह अमेरिकियों को बचाने की एक अविश्वसनीय लेकिन सच्ची सीआईए कहानी है। वहीं, रॉबर्ट डी नीरो की ‘द गुड शेफर्ड’ सीआईए के शुरुआती दिनों के संघर्ष को एक व्यक्ति के नजरिए से बेहद संजीदगी के साथ दिखाती है। जासूसी के मानवीय और राजनीतिक बोझ को समझना हो, तो 2006 की जर्मन फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ अदर्स’ से बेहतर कुछ नहीं हो सकता, जहाँ एक एजेंट की निगरानी में एक लेखक की पूरी जिंदगी बदल जाती है।
आज की ग्लोबल पॉलिटिक्स और तेल के खेल को समझने के लिए ‘सीरियाना’ एक अनिवार्य फिल्म है, जो दिखाती है कि कैसे खुफिया विभाग की एक छोटी सी हरकत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकती है। वहीं, ‘ब्रीच’ फिल्म एफबीआई के भीतर छिपे एक गद्दार और उसे पकड़ने के लिए चल रही साइकोलॉजिकल जंग की सच्ची दास्तां है। क्लासिक सिनेमा की बात करें, तो ‘आर्मी ऑफ शैडोज’ नाजी कब्जे के दौरान जासूसों द्वारा झेले गए टॉर्चर और उनके बलिदान की रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर पेश करती है।
अगर आपको ‘धुरंधर’ का यथार्थ पसंद आया है, तो ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ और टॉम हैंक्स की ‘ब्रिज ऑफ स्पाइज’ आपको जरूर देखनी चाहिए। ये फिल्में दिखाती हैं कि जासूसी केवल बंदूक चलाना नहीं, बल्कि वकीलों और एजेंटों के बीच होने वाली शतरंज की चालें भी हैं। ‘ए मोस्ट वांटेड मैन’ अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और धीमी रफ्तार के सस्पेंस का बेहतरीन मेल है।
लेकिन, इस सूची में सबसे ऊपर जिस फिल्म का नाम आता है, वह है ‘टिंकर टेलर सोल्जर स्पाई’। इस फिल्म में कोई फालतू का मसाला या गैर-जरूरी एक्शन नहीं है। यह पूरी तरह से खुफिया एजेंसी के भीतर छिपे एक ‘मोहरे’ सोवियत जासूस को ढूंढने की दिमागी कसरत है। इसकी बारीकियों और जासूसी के सटीक चित्रण की वजह से खुद असली जासूसों ने इसे हकीकत के सबसे करीब बताया है। यह फिल्म जासूसी के उस बोरियत भरे लेकिन बेहद तनावपूर्ण हिस्से को दिखाती है, जो आम तौर पर फिल्मों में नहीं दिखता।
