संकटों के बीच फिल्म की शूटिंग पूरी की गई
विवेक ने बताया कि साल 2025 उनके लिए संघर्ष का साल रहा। फिल्म बनाना पहले से ही चुनौतीपूर्ण था, लेकिन शूटिंग शुरू होने से ठीक पहले प्रोडक्शन डिजाइनर रजत पोद्दार का अचानक निधन टीम के लिए बड़ा झटका था। उन्होंने कहा, “रजत पोद्दार के नाम पर हमने विजन पूरा किया। भव्य सेट तैयार किए गए और फिल्म की शूटिंग पूरी की गई। टीम ने हिम्मत नहीं हारी।”
विरोध और धमकियों के बीच रिलीज़
‘द बंगाल फाइल्स’ उनकी ‘फाइल्स’ ट्रायोलॉजी की तीसरी कड़ी है, जो 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे, नोआखाली दंगों और विभाजन के दौरान हुए हिंदू नरसंहार की कहानी दिखाती है। फिल्म को लेकर पहले ही विरोध शुरू हो गया। विवेक ने बताया कि कोलकाता में हमले, धमकियां और राज्य में अनऑफिशियल बैन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा, “सीबीएफसी ने प्रमाणन दे दिया था, लेकिन राज्य में रिलीज नहीं हो पाई। थिएटर मालिकों पर दबाव डाला गया, और देश की सबसे बड़ी एग्जीबिशन चेन भी बंगाल में इसे नहीं दिखा पाई।”
सत्य की खोज और लोकतंत्र की चुनौती
विवेक ने कहा कि फिल्म हिम्मत, सत्य की खोज और चुनौतियों का सामना करने की कहानी है। उन्होंने आलोचना करते हुए बताया कि कुछ संस्थाएं, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाई गई हैं, इस मामले में नाकाम रहीं। “मैं इसे सरकार की हार मानता हूं। यह फिल्ममेकर्स के लिए सबक है कि कितनी भी बड़ी ताकत हो, कुछ शक्तियां सबको पीछे धकेल देती हैं।”
नई पीढ़ी और बदलाव की उम्मीद
विवेक ने अपनी किताब ‘अर्बन नक्सल’ का जिक्र करते हुए कहा, “मैं अपनी किताब और लेख के जरिए हमेशा इन ताकतों के खिलाफ आवाज उठाता रहा, लेकिन इस घटना ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। सवाल उठता है कि नई पीढ़ी इससे कैसे लड़ेगी और भारत का भविष्य क्या होगा?” उन्होंने खुशी व्यक्त की कि तमाम चुनौतियों के बावजूद फिल्म रिलीज हुई और जहां भी दिखी, वहां दर्शकों के दिल में बदलाव आया। लोग समझ पाए कि केवल इतिहास ही नहीं, वर्तमान का सत्य भी दबाया जा रहा है।
विवेक अग्निहोत्री की यह प्रतिक्रिया यह संदेश देती है कि सच को उजागर करना और उसकी रक्षा करना, चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, आज भी हर नागरिक और फिल्ममेकर का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।
