प्लेबैक सिंगर साधना सरगम का असली नाम साधना घाणेकर है। उन्होंने अपने नाम के पीछे की कहानी बताते हुए कहा कि माता-पिता ने उन्हें साधना इसलिए नाम दिया ताकि जीवन भर संगीत की साधना याद रहे। जब वे शिमला प्रोग्राम के लिए कल्याणजी-आनंदजी के पास गईं, तो उन्होंने सुझाव दिया कि नाम में सरगम जोड़ दें। साधना ने तुरंत हां कर दी और तब से उनका नाम साधना सरगम फिल्मी दुनिया में मशहूर हो गया।
साधना ने अपने शुरुआती संगीत सफर के बारे में बताया कि चार साल की उम्र से उन्होंने गाना शुरू कर दिया था। घर में शास्त्रीय संगीत का माहौल था क्योंकि उनकी मां नीला घाणेकर संगीत सिखाती थीं। शुरुआत में उनका सपना केवल शास्त्रीय गायिका बनने का था। उन्हें सेंट्रल गवर्नमेंट स्कॉलरशिप मिली और पंडित जसराज के पास शास्त्रीय शिक्षा का अवसर मिला। लेकिन बाद में प्लेबैक सिंगिंग की ओर उनका रुझान बढ़ा। साधना ने बताया कि तीन मिनट में गाने की परफेक्शन पाने की चुनौती उतनी ही कठिन है जितनी तीन घंटे का शास्त्रीय गायन।
उनकी पहली रिकॉर्डिंग महज पांच साल की उम्र में वसंत देसाई के साथ हुई थी। मराठी कविता पर आधारित गीत में उन्होंने अपनी गुड़िया साथ रखी थी। फिल्म ‘गुड्डी’ के गाने “हमको मन की शक्ति देना” के जरिए उन्होंने कल्याणजी-आनंदजी को प्रभावित किया और अपना पहला मौका पाया।
साधना सरगम ने अपने प्रेरणा स्रोतों का भी जिक्र किया। उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोसले, किशोर कुमार, मुकेश और मोहम्मद रफी का नाम लिया। उनका कहना है कि इन कलाकारों की आवाज सुनकर लगता है कि संगीत कितनी ऊंचाई छू सकता है। लता जी ने उन्हें सिखाया कि सुर सही जगह पर लगना ही असली एक्सप्रेशन है।
मराठी परिवार से होने के बावजूद उन्होंने हिंदी-उर्दू उच्चारण पर ध्यान दिया। मौलवी सैय्यद अहमद सैय्यद से उर्दू पढ़-लिखी, जिससे फिल्म ‘कलिंगा’ में दिलीप कुमार के सामने गाने का आत्मविश्वास मिला।
साधना सरगम का लक्ष्य हमेशा साफ रहा है: संगीत के जरिए लोगों को सुकून देना। वह कहती हैं कि अच्छा इंसान बनना अच्छे सिंगर बनने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। आज भी वे रोज रियाज करती हैं और संगीत की साधना को कभी कम नहीं होने देतीं। उनकी यह लगन और मेहनत उन्हें भारतीय संगीत जगत की खास पहचान देती है।
