विवियन ने खुलासा किया कि इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उन्होंने अपनी आस्था और जीवनशैली में कई बदलाव किए। वे अब पांच वक्त की नमाज नियमित रूप से पढ़ते हैं और रमजान के महीने में रोजा रखते हैं। उन्होंने बताया कि उनका रोजा बहुत सादगी से खुलता है—तीन खजूर, एक गिलास दूध और थोड़ा पानी। इसके अलावा, वे घर पर विशेष ‘डेट मिल्क’ तैयार करते हैं जिसमें खजूर, शहद, सूखे मेवे और ताजे फल मिलाते हैं। इस परंपरा के माध्यम से वे अपनी इफ्तार करते हैं।
HT को दिए इंटरव्यू में विवियन ने कहा कि रमजान उनका जीवन बदलने वाला महीना रहा। उन्होंने बताया, “रमजान आस्था का महीना है। यह हमें संस्कार और मूल्य सिखाता है। इस दौरान हमें यह भी समझ आता है कि जिन लोगों के पास भोजन नहीं है, वे किस तरह की कठिनाइयों से गुजरते हैं।” विवियन ने यह भी कहा कि रमजान का महीना हमारी आदतों को ‘रीसेट’ करने और आत्म-अनुशासन बढ़ाने का अवसर है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें अपनी सुबह की कॉफी छोड़नी पड़ती है, और पानी भी नहीं पीते। इससे शरीर वैज्ञानिक रूप से 30 दिनों के लिए ‘डिटॉक्स मोड’ में चला जाता है।
विवियन ने जकात (चैरिटी) देने की भी अहमियत पर जोर दिया और कहा कि वह अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। उनका मानना है कि चैरिटी का उद्देश्य केवल प्रचारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे एक जिम्मेदारी के रूप में निभाना चाहिए।
विवियन की निजी जिंदगी भी चर्चा में रही है। धर्म परिवर्तन और दूसरी शादी के बाद उन्हें ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा, लेकिन इसका असर उनके खुशहाल जीवन पर नहीं पड़ा। विवियन और नौरान अब साथ में संतुलित और खुशहाल जीवन जी रहे हैं। वे अपने करियर और परिवार दोनों में संतुलन बनाए हुए हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पांच वक्त की नमाज और रोजा उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, चाहे रमजान का महीना हो या न हो। विवियन का यह अनुभव यह दिखाता है कि चाहे जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ आएं, आस्था और अपने सिद्धांतों का पालन हमेशा मार्गदर्शक होता है।
विवियन डीसेना की कहानी बताती है कि धर्म और आस्था के बदलाव से जीवन में स्थिरता और संतुलन पाया जा सकता है, और निजी निर्णयों को अपनाकर भी कोई व्यक्ति खुशहाल और संतुलित जीवन जी सकता है।
