महानायक अमिताभ बच्चन इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। साल 1984 में उन्होंने एक्टिंग से ब्रेक लेकर राजनीति में कदम रखा और इलाहाबाद सीट से रिकॉर्ड जीत दर्ज की। उस वक्त माना जा रहा था कि वह राजनीति में लंबी पारी खेलेंगे लेकिन तीन साल बाद ही 1987 में उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में कई मौकों पर बिग बी ने यह संकेत दिया कि राजनीति उनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी।
गोविंदा भी उन स्टार्स में शामिल हैं जिन्होंने राजनीति को लेकर खुलकर पछतावा जताया। साल 2004 में कांग्रेस के टिकट पर मुंबई नॉर्थ से लोकसभा चुनाव जीतने वाले गोविंदा ने 2009 में राजनीति से दूरी बना ली। कई इंटरव्यू में उन्होंने माना कि राजनीति ज्वाइन करना उनके जीवन की एक बड़ी गलती थी।
उर्मिला मातोंडकर ने भी कांग्रेस के साथ राजनीति में एंट्री ली। उन्होंने मुंबई नॉर्थ सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। चुनाव के कुछ ही दिनों बाद उर्मिला ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लिया।
साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत ने भले ही चुनाव नहीं लड़ा लेकिन उनकी राजनीतिक घोषणा ने देशभर में हलचल मचा दी थी। 2017 में उन्होंने रजनी मक्कल मंडराम पार्टी बनाने का ऐलान किया मगर 2021 में खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए राजनीति में सक्रिय रूप से उतरने से इनकार कर दिया।
संजय दत्त ने भी समाजवादी पार्टी के साथ सियासी सफर शुरू किया था। साल 2008 में पार्टी से जुड़े संजय को जनरल सेक्रेटरी बनाया गया लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने न सिर्फ पद छोड़ा बल्कि पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया।
जावेद जाफरी ने 2014 में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की और चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद वे राजनीति में सक्रिय नजर नहीं आए। वहीं शेखर सुमन ने 2009 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा हार के बाद 2012 में पार्टी छोड़ दी और बाद में साफ कहा कि वह दोबारा राजनीति में नहीं आएंगे।
मराठी सिनेमा के चर्चित नाम महेश मांजरेकर ने भी 2014 में चुनाव लड़ा लेकिन हार के बाद उनका राजनीतिक सफर वहीं थम गया। इन सभी उदाहरणों से साफ है कि फिल्मों की लोकप्रियता राजनीति में सफलता की गारंटी नहीं होती। राजनीति की जटिलताएं दबाव और जिम्मेदारियां हर किसी के बस की बात नहीं होतीं और यही वजह है कि कई सितारे जल्द ही इस दुनिया से दूरी बना लेते हैं।
