हमारे कुटुंब परिवार के मुखिया वयोवृद्ध हीरालाल जी यादव ने 90 वर्ष की आयु में 20 मार्च की रात एक बजे आखिरी सांस ली ओर उनका देह निस्तेज हो गया । वे मर गए पर हम सम्मान से कहते है उनका देहांत हो गया। देह का अंत तो अन्त्येष्टि क्रिया के बाद देह को अग्नि में जलाने के बाद होता है, पर हम शब्दों में मृतांत भी नहीं कहते क्योकि मृत का अंत नही होता है। हम समान्यतया बोलने-लिखने को विवश होते है कि हमारे घर परिवार के लिए भीषण दुख कि घड़ी है, जो हमारे अमुक जी नहीं रहे, उन्होने प्राण त्याग दिये, उनका देहांत हो गया, वे अब हमारे बीच नहीं रहे? उनकी शवयात्रा उनका पार्थिव शरीर इतने बजे फलां स्थान से राजघाट प्रस्थान करेंगी। ढेर सारी बातें शब्दों के गुच्छों में पिरोकर लिखते है ओर उनका गुणगान कर उनके अच्छाइयों को व्यक्त करते है, हीरालाल जी यादव मेरे पिताजी के सगे चाचा थे, इसलिए वे मेरे बाबा हुये ओर मेरे परिवार में सम्बन्धों कि कड़ी में वे सबसे बड़े थे, वे युवावस्था में ही रेलवे विभाग में नोकरी लगने पर अपने घर परिवार से पृथक उन सरकारी क्वाटरों में रहते आए जहा वे पदस्थ रहे। उनकी आखिरी पदस्थी लोकोयार्ड इटारसी रही जहा से दो दशक पूर्व वे सेवानिर्वृत हो अपनी पैतृक भूमि पर ग्वालटोली लौट आए ओर कल 21 मार्च को इसी भूमि से उनकी अतिम विदाई हुई। शमशान घाट पर बड़े बेटे राजेश अर्थात मेरे काका जी ने उनको मुखाग्नि दी।
आज से चार दशक पूर्व जब पत्रकारिता कि शुरुआत हुई तब मुझे पिताजी ने हीरालाल बाबा जी के घर इटारसी एक निमंत्रण देने भेजा था, तबसे मैं उन्हे पहचानता हूँ वे घर परिवार के लोगों के लिए मात्र एक पडोसी बनकर ही रहे, नातेदारी-रिश्तेदारी, सगे संबंधियों के प्रति उनका संबंध शून्य रहा है ओर औपचारिकतावश वे घर पर आने वालों कि आवभगत अवश्य किया करते थे। उनके बड़े बेटे अर्थात राजेश काका जी अहमदाबाद में निजी कंपनी में नौकरी करते हुये वही मकान बनाकर वही के वासी हो गए ओर छोटे बेटे त्रिलोक काका वकालत पास करने के बाद कौर्ट में वकालत करने में असफल होने पर ऑनलाइन डाक्यूमेंट बनाने का छुटपुट काम में जुट गए। बाबा हीरालाल जी को पैतृक संपती के हिस्से में परिवार से मिलने वाली जगह सदियों से बने देवचबूतरा से सटकर मिली किन्तु उन्होने घर-परिवार के मुखिया होते हुये अपने भतीजों आदि से वैचारिक मतभेद होने पर मोहल्ले में ही हेयरकटिंग सेलून चलाने वाले उनके साथी गनेशराम श्रीवास के छोटे बेटे प्रशांत श्रीवास को बेचकर कुटुंब –परिवार द्वारा पूजने हेतु एकत्र होने वाले चबूतरा कि सीमाओं को संकुचित करने का अपराध अनजाने ही किया जिसका उन्हे बाद में अपराधबोध रहा है।
कोरोनाकाल में दादी जी चलवसी जिनका चेहरा किसी ने नही देखा ओर न ही उनके पार्थिव शरीर को किसी का हाथ लग सका, एक दिन अपनी पीड़ा सुनाते हुये बाबा ने मन कि बात बताई कि तेरी दादी ने वह परिवार कि चुबूतरे से सटी जमीन परिवार को देने कि बजाय नाई को बेचने को बाध्य किया, उनका अंत बुरा हुआ, पर वे अंदर से टूट चुके थे ओर ज्यादा बीमार होने पर बड़े काका जी राजेश के अहमदाबाद के घर से ग्वालटोली लौट आए। बाबा हीरालाल जी दादी कि मृत्यु का दुख भूल भी न पाये थे कि उनका दामाद छत्रपाल यादव जी भी चल बसे ओर बेटी पर दुख का पहाड टूट पड़ा। जीवन यही है हर हाल में चलता रहता है, बाबा का जीवन भी चलता रहा ओर आखिरकार 15 मार्च को बाबा हीरालाल जी का स्वास्थ बिगड़ा तब उन्हे अशोक अस्पताल में भर्ती कराया जहा 20 मार्च को उन्होने सबसे विदा ले ली । बाबा चल बसे …हम सिवाय प्रार्थना करने के लिए ही है कि उन्हे अपने चरणों में स्थान दे,वे गोलोकवासी हो, वे कृष्णलोक वासी हो, वे बैकुंठवासी हो गए
