
मोक्ष या ब्रह्मानंद सुख की व्याख्या, सरल भाषा, भगवद्गीता के श्लोकों और जीवन से जुड़े उदाहरणों के साथ —उपदेश की तरह नहीं, समझ की तरह..
मोक्ष या ब्रह्मानंद सुख — कृष्ण की दृष्टि से..
भौतिक सुख से ऊबकर मनुष्य अक्सर कहता है—
“मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस शांति चाहिए।”
यहीं से मोक्ष की खोज शुरू होती है।
कृष्ण इसे नकारते नहीं,
पर इसे अंतिम मंज़िल भी नहीं मानते।
1️⃣ मोक्ष सुख क्या है..?
मोक्ष या ब्रह्मानंद सुख का अर्थ है—
मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ — यह बोध
जन्म–मृत्यु के भय से मुक्ति
दुःखों का अभाव
मन की शांति और समता
यह सुख त्याग और ज्ञान से आता है।
गीता का श्लोक
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥
(गीता 18.54)
सरल अर्थ
जो ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है—
वह न शोक करता है,
न किसी की लालसा करता है
सबमें समान भाव रखता है
और फिर—
वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण संकेत देते हैं:
मोक्ष अंत नहीं,
भक्ति की दहलीज़ है।
2️⃣ ब्रह्मानंद सुख का स्वरूप ब्रह्मानंद में—
दुःख नहीं होता
भय नहीं होता
प्रतिस्पर्धा नहीं होती
पर साथ ही—
रस नहीं
संबंध नहीं
प्रेम का आदान–प्रदान नहीं
यह सुख शून्य के पास की शांति है।
उदाहरण
गहरी नींद: दुःख नहीं, पर आनंद का अनुभव भी नहीं
एकांत मौन: शांति है, पर उल्लास नहीं
सब छोड़ देने की अवस्था: हल्कापन है, पर अपनापन नहीं
श्रीकृष्ण कहते हैं—
आत्मा केवल शांति नहीं, आनंद की भूखी है।
3️⃣ मोक्ष-सुख क्यों अधूरा है…?
गीता का श्लोक
आनन्दमयोऽभ्यासात् (वेदांत सूत्र)
आत्मा आनंदमय है।
यदि आत्मा आनंदमय है,
तो केवल दुःख का अभाव उसे कैसे संतुष्ट करेगा?
कृष्ण का स्पष्ट कथन
येऽन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥
(गीता 9.23)
भावार्थ:
जो सत्य को आंशिक रूप में पकड़ता है,
वह भी अप्रत्यक्ष रूप से मेरी ओर ही आता है—
पर पूर्णता नहीं पाता।
4️⃣ मोक्ष की सीमा — पतन का संकेत
कृष्ण गीता में सावधान भी करते हैं—
आस्थिताः पतन्त्यधः (संकेत)
ज्ञान में स्थित होकर भी
यदि सेवा और भक्ति न हो,
तो पुनः अहंकार या कर्म में गिरने की संभावना रहती है।
उदाहरण
सन्यासी पुनः संसार में उलझ जाते हैं
“मैं मुक्त हूँ” का सूक्ष्म अहंकार
समाज और जीवन से कटाव
श्रीकृष्ण का मत:
जहाँ संबंध नहीं, वहाँ स्थायित्व नहीं।
5️⃣ कृष्ण का समाधान: मोक्ष से आगे…?
कृष्ण कहते हैं—
“मुक्ति तुम्हारी योग्यता है,
पर मेरा उद्देश्य तुम्हें प्रेम देना है।”
गीता का श्लोक
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥
(गीता 7.19)
सरल अर्थ
अनेक जन्मों के ज्ञान के बाद
जब ज्ञानी यह समझता है कि
वासुदेव ही सब कुछ हैं,
तब वह मेरी शरण आता है।
अर्थात— ज्ञान → मोक्ष → भक्ति
6️⃣ एक सार
अवस्था
अनुभव
भौतिक सुख
उत्तेजना
मोक्ष सुख
शांति
भक्ति सुख
आनंद + प्रेम
मोक्ष में मैं शांत हूँ,
भक्ति में कृष्ण प्रसन्न हैं—
और वही आत्मा की पूर्ण तृप्ति है।
सार वाक्य
मोक्ष आत्मा को हल्का करता है,
पर भक्ति आत्मा को जीवंत बनाती है।
यदि चाहें, तो अगली कड़ी में
मैं भक्ति-सुख (कृष्ण-प्रेमानंद) को
उसी सरल, जीवन से जुड़े ढंग में प्रस्तुत कर सकता हूँ।
हरे कृष्ण 🌿
दासानुदास चेदीराज दास.
