शहरनामा :- मौन के बाद का संवाद
कुछ संवाद
शब्दों से पहले नहीं,
मौन के बाद शुरू होते हैं।
मौन के पहले
हम बोलते हैं—
अपनी बात,
अपना पक्ष,
अपना सत्य।
मौन के बाद
हम सुनने लगते हैं—
दूसरे का मन,
दूसरे की थकान,
दूसरे का भय।
यही
वास्तविक संवाद है।
मौन कोई खालीपन नहीं
मौन वह जगह है
जहाँ शब्द
विश्राम लेते हैं।
जब क्रोध थक जाता है,
जब शिकायतें चुप हो जाती हैं,
जब आँसू बहकर
हल्के हो जाते हैं—
तब मौन आता है।
और उसी के बाद
संवाद संभव होता है।
गीता इसी क्रम को पहचानती है—
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
(गीता 6.14)
शांत चित्त से ही
दृष्टि साफ होती है।
मौन से पहले और बाद का फर्क
मौन से पहले
हम जीतना चाहते हैं।
मौन के बाद
हम समझना चाहते हैं।
मौन से पहले
“मैं सही हूँ”
मुख्य होता है।
मौन के बाद
“हम सुरक्षित रहें”
महत्वपूर्ण हो जाता है।
घर, संबंध, समाज—
सब यहीं बदलते हैं।
घर में मौन के बाद का संवाद
घर में यह संवाद
अक्सर ऐसे होता है—
बिना सफ़ाई दिए माफ़ी
बिना सवाल किए स्वीकार
बिना समाधान दिए साथ बैठना
यह संवाद
व्हाट्सऐप पर नहीं,
डाइनिंग टेबल पर नहीं—
दिल के बीच होता है।
गीता इसे कर्म का उच्चतम रूप मानती है—
समत्वं योग उच्यते
(गीता 2.48)
संतुलन—
न अधिक बोलना,
न अधिक चुप रहना।
माता‑पिता और बच्चों के बीच
बच्चों के साथ
मौन के बाद का संवाद
सबसे आवश्यक है।
जब डाँट
खामोशी में बदल जाए,
और बच्चा
अब भी पास आकर बैठे—
वही संवाद है।
वहाँ कोई भाषण नहीं,
केवल भरोसा होता है।
दांपत्य में मौन के बाद
पति‑पत्नी के बीच
सबसे गहरा संवाद
अक्सर बिना शब्दों के होता है—
साथ बैठकर चाय पीना
एक‑दूसरे की थकान देख लेना
पुराने विषयों को
दोबारा न उछालना
यह समझ
शब्दों से नहीं आती,
यह मौन से उपजती है।
भक्ति: मौन के बाद
भक्ति भी
मौन के बाद शुरू होती है।
जब प्रार्थना के शब्द
खत्म हो जाते हैं,
और केवल
उपस्थिति बचती है—
तब संवाद होता है।
गीता कहती है—
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्
(गीता 10.10)
जो प्रेमपूर्वक जुड़े हैं,
उन्हें भीतर से मार्ग मिलता है।
समापन
मौन से डरिए मत।
वह टूटन नहीं,
तैयारी है।
जो लोग
मौन के बाद भी
साथ बैठे रह सकते हैं,
उन्हें बहुत कुछ
कहने की ज़रूरत नहीं होती।
क्योंकि वहाँ संवाद
शब्दों में नहीं,
समझ में होता है।
और शायद
यही घर का,
यही जीवन का,
यही गीता का
सबसे परिपक्व अध्याय है।
दासानुदास चेदीराज दास

