
सुनो! आगामी पीढियों के आनेवाले समय मे सम्मानित होने वाले भावी साथियो। हे नाना प्रकार की उपाधि, पुरस्कार सम्मान के योग्य वारिसो ! संसार में अनेक प्रकार की आधि-व्याधि है जिसमें उपाधि देकर सम्मानित करने का चलन है, नेक जन या अनेक मन इस चलन के पेरोकार है ओर हर श्रेणी की उपाधिया देकर अपनी आजीविका चला रहे, जन्मजात व्यवसायियों। जिन्हे अपनी बेईमानी प्राणघातक नहीं लगती किन्तु दूसरे की ईमानदारी उनके प्राणों में चुभती है वे सभी विचित्र पागलपन के दीवानों! सब कुछ उधार का या मांग चुंगकर चंदा आदि से जनहित में देशसेवा के नाम पर पुरस्कारों की झड़ी लगाकर खुद महान कहानेवालो, ओर दूसरों को महानता की उपाधि प्रदान करनेवालों! देखा जाये तो उपाधि या सम्मान का हकदार भी वही होता है जो जरूरत से ज्यादा आदर्शवान होता है, उच्च दर्जे के लेखक,कवि, साहित्यकार ओर पत्रकार के आदर्श उनकी लेखनी में होते है, जरूरी नहीं की उन्हे आदर्शवान समझा जाये? माना कि अब कई लोग बेईमानी से ऊबकर आदर्श इकठ्ठा करने लगे है, ताकि उनका व्यक्तित्व निरमा वाशिंग पावडर से धुला साफ सफ़ेद चमकता दमकता दिखाई दे। यदि आदर्श की फसल होती तो वे रईसजादे जो जमीदार, कलीदार,फलीदार गलीदार आदि आदि है, अपनी ज़मीनों में इतना आदर्श पैदा कर सकते थे की, उनके घर आँगन में, गाँव शहर में, जमी-आसमान में जहां देखो वहाँ चरो दिशाओं में आदर्श ही आदर्श का अम्बार लगा होता ओर उन्हे आदर्श का विश्वव्यापी निर्यातक बनकर हर शहर गाँव ओर देशविदेश में आदर्श की मांग पर आपूर्ति करने को विवश होना पड़ता वही राज्य से लेकर अन्तराष्ट्रिय बाजार में आदर्श सप्लायर के रूप में आपका ब्राण्ड बाजी मार लेता। आपसे खरीदे आदर्श को पाकर चोर उचक्के देश दुनिया के मंचो पर धूम मचकार भले ही दुर्व्यवहार को आदर्श के बदले व्यवहार में मानवीयता का प्रदर्शन करने का रिकार्ड बना ले किन्तु आदर्श के लिए मुहमांगी बोली लगाकर सबसे ऊंचे दामों पर आदर्शवान बन समाज, संस्थाओं ओर सरकार से एक से एक सम्मान पाने लगे तो यह आपके व्यापार की महानतम उपलब्धि ही होगी, जिसे देशसेवा के बदले मेवा का लज्जतदार स्वाद से नामी गिरामी हुआ जा सकेगा।
बड़े-बड़े आयोजनों में रईसजादो सहित बड़े लोगों से बड़े बड़े सम्मान पाने वाले क्षुद्र लोग असल मदारी का खेल खेलते है जिसमें मदारी के हाथ खूबसूरत बंदर ओर बंदरिया दूल्हा दुल्हन के रूप में सम्मान पाने का खेल दिखाते है जिसका सभी को मजा आता है। सम्मान पाने की खबर आग की तरह फैलती है ओर लोग दौड़े-दौड़े आते है तारीफ करते है, बधाई संदेश ओर शुभकामनायों के हजारो लाखों फालोवर बन जाते है, जैसे जीते जी स्वर्ग का आनंद मिल गया हो। सम्मान आयोजन कार्यक्रम के बाद खर्च देख मन ओर आत्मा एक दूसरे को ताकते है, मन की बांछे खिली होती है ओर आत्मा निगोड़ी जिसे कुछ करना धरना नहीं, आना जाना नहीं फिर भी अपने अंदर झांककर चरित्रहीनता के घने जंगलों में आदर्श को तलाशती है, जो दिखाई नहीं देता, वह मन से इस बाबत प्रश्न करे उसके पूर्व ही वह आत्मा से कह उठता है रांड कही की जो सम्मान का पचा नहीं पा रही है ओर मुझ मन का बेबाजह चोर समझ पीछा कर रही है?
आप भी अपनी आँखो से ऐनक उतार दो मैं तुम्हें अपने युग और इसमे घुटनभरी सांस लेकर लिखना जारी रखने वाले अपने अग्रज बाबू मुसाय संजीव डे राय के सम्बन्ध में कुछ बताता हूँ। असल में आप नए हिंदुस्तान को जी रहे है ओर वे पुराने हिंदुस्तान की परिपाटी के महानायक गांधी जी पर आकार थम गए है। वे देख रहे है कि आज हिंदुस्तान जख्मी है, घायल है, लहू लुहान हूँ, उसके पैरो में टूटे-फटे जूते है, उसके तन पर निरे चीथड़े ओर पेट धसा हुआ है जबकि आप हिंदुस्तान को आधुनिक लिबास में, दुनिया के साथ कदमताल करता विकसित मानते हुये दोनों हाथो से लूट रहे हो। आपको देश में करोड़ों पढ़े लिखे बेरोजगार दिखाई नहीं देते, देश का पूरा संसाधन लूटा जा रहा है, कानून ओर शासक मिलकर जंगल, जमीन, पहाड़ ओर नदियों का अस्तित्व मिटाने के लिए हद दर्जे तक गिर चुके है, गरीब कमजोर को शराब में धुत्त कर रखा है, मध्यम वर्ग जो कमा रहा है सरकार को टेक्स दे रहा है, बड़े पूंजीपति मालामाल है, सरकार का खजाना खाली है, जो उसमें दिखाई देता है वह कर्जे का विकास है, देश के हर नागरिक पर लाखो का कर्जा है, पर मेरे अग्रज यह सब देख रहे है इसलिए वे हिंदुस्तान को जख्मी, लहूलुहान देख रहे है ओर फिर कभी बेड़ियों में न जकड़े इसलिए वे अपनी लेखनी को विराम देने हेतु रिटायर्ड नही होना चाहते है ओर लिखना जारी रखना चाहते है।

कृष्णमय राधाभक्ति में लीन मेरे अग्रज नर्मदापुरम के वरिष्ठ पत्रकार संजीव डे राय है जो जीवन के 70 बसंत पार करने के बाद भी पत्रकारिता के मिथक बन गए है, उनकी लेखनी षोडशी कमनीय बाला के दमकते चेहरे ओर अल्हड़ चाल की तरह युवा है जो क्या सांसद क्या विधायक, क्या कलेक्टर, क्या जिला प्रशासन के आला अधिकारी हो या शहर के नामी गिरामी बदमाश, इस सभी को बिंदास छेड़कर पंगा लेने से बाज नहीं आते? जब भी ये सभी अपनी ज़िम्मेदारी का निष्ठापूर्ण निर्वहन नहीं कर अपने कर्तव्य से मुह मोड़े हुये होते है ओर इससे जिले के विकास का पहिया थम गया होता है ओर जनता बेहाल होती है? तब संजीव जी इन्हे इनका वास्तविक चेहरा दिखाकर समाज के सामने लाते है ओर ये सभी महसूस करते है की यह तो सरेआम उन्हे नंगा किया जा रहा है, पर संजीव जी का लिखना जारी है। वे सोसलमीडिया पर राधाकृष्ण ओर तुलसी जी की मांगलिक आरती के सुबह दर्शन कराकर सभी के प्रेरणास्त्रोत ओर मार्गदर्शक हो सकते है किन्तु समाचारों में क्या लिखना है, कितना लिखना है ओर कहाँ तक लिखना है, बस समझिए प्रदूषण मुक्ति के लिए वे बगीचे के तिलिश्म की भूलभुलैया के इर्द-गिर्द से बाहर नही निकल सके है ओर उनकी लेखनी लीक से हटकर बगीचे की अय्यारी पर शब्दों की जादूगरी बिखेर रही है। वे पाठकों से मिलने वाली प्रशंसा के पीछे उसी तरह भाग रहे है जैसे राम स्वर्ण हिरण के पीछे भागे थे, उनका भागना रेगिस्तान में जल की खोज में मृगमरीचिका का पीछा भर करना है। उनके जोश ओर उदीयमान संस्कारों की तपिस से ऊष्मा पाकर पाठक तो खुश होता है ओर कुछ पाठक इन्हे पुंछवाले पत्रकार मानकर इनकी पुंछ सहलाकर खुद को पुंछवाला बनाने में जुटे है।
आप बाबू मुसाय को देख ही रहे हो कि वे आपके युग में जमी हुई मलिनताओं के रश्मि प्रकाश को, जो अन्धकारमयी और मृतप्राय परिपाटियों ओर अस्तित्वहीन हो चुकी कन्दराओं की ओर निहारते हुये उनपर से पर्दा उठा रहे है। पर्दा गिरते ही कोई बात पर रोता है, कोई औकात पर रोता है कोई अभी रोता है तो कोई भविष्य मे रोते मिल सकता है, यह रोना अपने अंदर धसना है किन्तु कुछ लोग अपनी आँखों में स्वार्थ का ऐनक पहने रोते हुये भी हँसते लगते है। कई लोग है जो बाबू मुसाय को आदर्श समझते है किन्तु इस आदर्श को कोई उपाधि इस शहर ने नही दी है, ओर बाबू मुसाय प्रोमोट होने से डरते है ओर कछुए की चाल चलते है ताकि अगर कोई दौड़ की प्रतिस्पर्धा हो तो लोग उसमें इन्हे नहीं पा सके। अगर किसी गोल्डमेडल प्राप्त उच्च शिक्षित एलएलबी, एलएलएम डिग्रिधारी को उसकी योग्यता के लायक नौकरी मिलती है तो उच्च पद अर्थात उपाधि भी मिलती है, अगर मजबूरी में यह डिग्रिधारी बाबू बनकर समझोता करे तो उसके साथ नाइंसाफी ही होगी। शताब्दियों से इसी मृगमरीचिका के होते हुये बाबूमुसाय जैसे हीरा भी आदर्शवान होते हुये भी किसी पुरस्कार उपाधि सम्मान से वंचित है। बाबू मुसाय जी अपनी पूर्ण क्षमता के साथ गौरव का पात्र होने से सम्मानित किया जा सकते थे,किन्तु इन जैसे ओर भी प्रतिभासम्पन्न है जिनका अपनी साँसों के बंद होने तक लिखना जारी रखने का इरादा है पर क्या कीजिएगा योग्य पुरस्कार, उपाधि सम्मान के वारिस की खोज ही नही होती, वरना देश की प्रतिभाए अपने जीते जी उपाधियों ओर सम्मानों से वंचित नहीं रहती।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथ धाम काली मंदिर के पीछे,ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोइल 999337661
