शहरनामा में आज-:
रावण का दरबार और हमारे मोहल्ले की मीटिंग
सुबह का अख़बार खोलते ही लगा—
आज वाल्मीकि रामायण नहीं,
नगर निगम की बैठक की कार्यवाही पढ़ रहा हूँ।
फर्क बस इतना है कि वहाँ मंच पर रावण थे
और यहाँ कुर्सियों पर अलग-अलग नामों वाले रावण बैठे हैं।
समाचार यह था कि श्रीराम समुद्र तट तक आ चुके हैं।
यानी—
ईश्वर अब दूर नहीं,
फाइल के आख़िरी पन्ने पर नहीं,
सीधे जीवन के दरवाज़े पर खड़े हैं।
और जब ईश्वर दरवाज़े पर खड़े हों
तो भीतर क्या होता है—
आइए, शहरनामा उसी बैठक की रपट पेश करता है।
पहला वर्ग : विभीषण टाइप नागरिक
दरबार में एक आवाज़ उठी—
साफ़, सधी हुई, बिना माइक के भी गूँजती।
यह थे विभीषण।
उन्होंने कहा—
“महाराज, मामला राम का है।
यह फ़ाइल नहीं, फ़ैसला है।
अभी सुधर जाइए, नहीं तो सब ढह जाएगा।”
शहर में भी ऐसे लोग होते हैं—
जो मीटिंग में खड़े होकर कह देते हैं:
“साहब, सड़क बनेगी नहीं तो चुनाव भी नहीं बनेगा।”
इनकी समस्या यह है कि
ये सच बोलते हैं,
और सच हमेशा
एजेंडा के बाहर की चीज़ होता है।
आध्यात्मिक अर्थ में
ये वे लोग हैं
जिनके भीतर विवेक ज़िंदा है।
ईश्वर आए हों तो पहचान लेते हैं।
पद जाए तो जाए,
पर आत्मा नहीं बेचते।
दूसरा वर्ग : रावण समर्थक दरबारी
फिर तालियाँ बजीं।
कुर्सियाँ खिसकीं।
एक से बढ़कर एक बयान आए—
“राम-वाम कुछ नहीं,
हमारी व्यवस्था मज़बूत है।”
“सेतु बनने से पहले ही
वानर थक जाएँगे।”
ये वही लोग हैं
जो शहर में कहते हैं—
“सब ठीक है,
बस मीडिया बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है।”
आध्यात्मिक भाषा में
यह अहंकार की पार्टी है।
ज्ञान है, डिग्री है, अनुभव है—
पर सिर पर “मैं” का हेलमेट इतना मोटा
कि ऊपर खड़ा भगवान भी दिखाई नहीं देता।
रावण भी यही गलती करता है—
राम सामने हैं,
पर उसे केवल अपनी ताक़त दिखती है।
ईश्वर को भी
प्रतिस्पर्धी मान लेता है।
तीसरा वर्ग : मौन दर्शक
और फिर
सबसे बड़ी संख्या उनकी थी
जो कुछ बोले ही नहीं।
वे जानते थे—
विभीषण सही है।
यह भी जानते थे—
रावण ग़लत है।
लेकिन बोले नहीं।
क्योंकि प्रमोशन, पोस्टिंग,
और “कल क्या होगा”
इन तीन देवताओं का डर था।
शहर में इन्हें कहते हैं—
“समझदार लोग।”
आध्यात्मिक दृष्टि से
यही सबसे ख़तरनाक वर्ग है।
क्योंकि ये न अधर्म करते हैं,
न धर्म का साथ देते हैं।
और याद रखिए—
ईश्वर के मामले में
तटस्थता भी अस्वीकृति होती है।
राम तट पर क्यों रुके?
राम ने सेतु तुरंत नहीं बनवाया।
वे तट पर खड़े रहे।
जैसे आज भी भगवान
हमारे जीवन में
एक आख़िरी मीटिंग बुलाते हैं—
बीमारी के रूप में,
संकट के रूप में,
या किसी विभीषण की आवाज़ बनकर।
वे कहते हैं—
“अब भी समय है।”
शहरनामा का निष्कर्ष
हर शहर में,
हर घर में,
हर मन में
एक रावण का दरबार लगता है।
प्रश्न यह नहीं कि
राम आए या नहीं—
वे तो रोज़ आते हैं।
प्रश्न यह है कि
हम किस कुर्सी पर बैठे हैं—
विभीषण की,
रावण की,
या मौन दर्शक की?
क्योंकि इतिहास बताता है—
राम युद्ध जीतते हैं,
पर मोक्ष केवल विभीषण पाते हैं।
—
दासानुदास चेदीराज दास
