शहर बदलते हैं। नक्शे नए खिंचते हैं। सड़कें चौड़ी होती हैं और इमारतें ऊँची। पर कुछ ऐसा भी होता है जो न भूगोल में दर्ज होता है, न इतिहास की पुस्तकों में। वह बस स्मृति में बसता है। मेरे लिए गाडरवारा वही स्मृति है, जो समय के साथ पुरानी नहीं होती बल्कि भीतर और गहरी उतरती जाती है।
जब मैं साठ वर्ष की देहरी पर खड़ा होकर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो गाडरवारा मेरे सामने एक जीवित चित्रशाला की तरह खुल जाता है। उसमें अरहर की सौंधी गंध है, शक्कर नदी की कलकल है, डोल ग्यारस की रंगीन भीड़ है, और उन गलियों की आत्मीयता है जहाँ हर चेहरा परिचित था। यह कस्बा मेरे जीवन का भौगोलिक स्थान भर नहीं, मेरे व्यक्तित्व की जड़ है।
गाडरवारा का नाम लेते ही मन में एक कोमल कंपन उठता है। यह वही भूमि है जहाँ कभी एक बालक रजनीश ने अपने प्रश्नों के बीज बोए थे। वही बालक जो आगे चलकर ओशो के नाम से दुनिया में जाना गया। गाडरवारा की गलियों, खेतों और स्कूलों में उसका बचपन बीता। यहाँ की खुली हवा, नदी की शांति और चौपालों की सहजता ने शायद उसके भीतर वह प्रश्नाकुलता जगाई होगी, जिसने आगे चलकर उसे चिंतन का वैश्विक प्रतीक बना दिया।
मुझे अक्सर लगता है कि इस छोटे से कस्बे की मिट्टी में ही कोई ऐसी जिज्ञासा है जो साधारण जीवन को भी असाधारण बना देती है। यही वह भूमि है जिसने रजनीश को ओशो बनने की दिशा दी और यही वह वातावरण है जिसने आशुतोष राणा जैसे कलाकार के व्यक्तित्व को आकार दिया।
आशुतोष राणा का नाम लेते ही गाडरवारा की रामलीला आँखों के सामने जीवित हो उठती है। रामलीला का वह मंच, मिट्टी की गंध, और दर्शकों की सांसों में घुली उत्सुकता। उन दिनों हम सबके लिए रामलीला किसी धार्मिक आयोजन से अधिक सांस्कृतिक उत्सव होती थी। उसी मंच पर एक युवा कलाकार अपने स्वर और अभिनय से लोगों को बाँध लेता था। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही युवक आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सशक्त अभिनेता बनेगा।
पर आशुतोष राणा की पहचान केवल उनके अभिनय से नहीं बनती। उनकी लेखनी, उनकी वाणी और उनके भीतर बसे गाडरवारा ने उन्हें विशिष्ट बनाया है। उनके शब्दों में आज भी उस कस्बे की मिट्टी की गंध है जहाँ उन्होंने जीवन के आरंभिक संस्कार पाए।
जब स्मृतियों का दरवाजा खुलता है तो सबसे पहले रेलवे स्टेशन याद आता है। दूर से आती ट्रेन की सीटी हमारे भीतर एक अनोखा उत्साह भर देती थी। स्टेशन से शहर तक आने के लिए टांगे चलते थे। घोड़े की टापों की लय और पहियों की चरमराहट में जैसे पूरे कस्बे का संगीत छिपा रहता था।
गाडरवारा की गलियाँ भी किसी जीवित पात्र की तरह थीं। पलोटन गंज से चौकी मोहल्ला तक, राठी तिगड्डे से पुरानी गल्ला मंडी तक हर रास्ते पर बचपन की छाप है। दोपहर में कंचों की खनक सुनाई देती थी। ग्यारह रुपये की शर्त पर खेले जाने वाले क्रिकेट के मैच होते थे, जिनमें एल बी डब्ल्यू का कोई नियम नहीं होता था। शाम को मंदिरों की घंटियाँ बजतीं और सुबह रामायण पाठ की धीमी ध्वनि वातावरण को पवित्र बना देती।
उस समय संवेदनाएँ किसी औपचारिकता की मोहताज नहीं थीं। किसी के घर दुख होता तो लोग बिना बुलाए पहुँच जाते। खुशी के अवसर पर भी यही सहजता रहती। आँखें ही निमंत्रण होतीं और मौन ही संवाद।
गाडरवारा की एक और खूबी थी यहाँ की सामाजिक एकता। हिंदू और मुस्लिम परिवारों के बीच संबंध इतने स्वाभाविक थे कि उन्हें विशेष रूप से उल्लेखित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। ईद पर सेवइयाँ बाँटी जातीं और होली पर रंगों का उत्सव सबके लिए समान होता। मस्जिद की अजान और मंदिर की घंटियाँ एक ही आकाश में गूँजती थीं और हमें उसमें कोई भेद दिखाई नहीं देता था।
श्याम टॉकीज भी हमारी स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा था। वहाँ फिल्म देखने जाना एक उत्सव जैसा होता था। कभी फिल्म के बीच बिजली चली जाती तो लोग घर जाकर भोजन करते और फिर टॉर्च लेकर वापस आ जाते। क्योंकि फिल्म अधूरी नहीं देखी जाती थी। शायद उसी तरह रिश्तों को भी अधूरा छोड़ना हमें स्वीकार नहीं था।
मेरे अपने जीवन की भी कितनी यादें इस शहर से जुड़ी हैं। मैं और मेरा छोटा भाई एक ही साइकिल पर बैठकर बी टी आई स्कूल जाया करते थे। आगे मैं पैडल चलाता और पीछे वह किताबों से भरा बैग संभाले बैठा रहता। रास्ते में पेड़ों की छाया होती और हवा में खेतों की खुशबू।
स्कूल के दिनों में जैन सर का पीरियड आते ही हम मित्रों की टोली किसी योजना के साथ गायब हो जाती। कभी रेलवे लाइन के किनारे जा बैठते, कभी पुलिया की छाँव में। वहाँ बैठकर किसी के टिफिन का स्वाद साझा करना भी किसी पर्व से कम नहीं होता था।
और फिर थी शक्कर नदी। आज वह सिकुड़ती हुई दिखाई देती है, पर कभी वही हमारी उमंगों की धारा थी। हम उसमें नाव नहीं चलाते थे, बल्कि अपने सपनों को तैराते थे।
समय ने गाडरवारा को भी बदला है। अब यहाँ चौड़ी सड़कें हैं, बिजली के खंभों की कतारें हैं और औद्योगिक विस्तार की धूल भी है। विकास अपने साथ सुविधाएँ लेकर आया है, पर कहीं न कहीं उस सहजता को भी छीन ले गया है जो कभी इस कस्बे की पहचान थी।
आज जब मैं इन परिवर्तनों को देखता हूँ तो मन में एक प्रश्न उठता है। क्या सचमुच हम आगे बढ़ गए हैं या हमने अपनी आत्मा का एक हिस्सा पीछे छोड़ दिया है।
फिर भी एक सत्य यह है कि गाडरवारा मेरे भीतर अब भी जीवित है। वहाँ अब भी घोड़े की टापों की आवाज सुनाई देती है। शक्कर नदी की लहरें चमकती हैं। रामलीला का मंच सजता है और किसी गली में एक बालक अपने प्रश्नों के साथ खड़ा दिखाई देता है, जो आगे चलकर ओशो बनने वाला है।
किसी दूसरी गली में एक युवा अपनी आवाज को साध रहा है, जो आगे चलकर आशुतोष राणा के रूप में मंच और परदे पर गूंजेगा।
इन दोनों व्यक्तित्वों ने गाडरवारा को विश्व के मानचित्र पर एक अलग पहचान दी है। एक ने चिंतन की दिशा दी, दूसरे ने कला और अभिव्यक्ति की शक्ति दिखाई।
जब मैं इन सबको याद करता हूँ तो महसूस करता हूँ कि गाडरवारा केवल एक कस्बा नहीं था। वह एक संस्कार था, एक संस्कृति था, एक ऐसा वातावरण था जहाँ साधारण जीवन भी असाधारण संभावनाओं से भरा रहता था।
आज भले ही शहर बदल गया हो, पर मेरे भीतर वह गाडरवारा अब भी साँस लेता है। उसकी गलियों में मेरा बचपन चलता है, उसके चौकों में मेरे मित्रों की हँसी गूँजती है, और उसकी हवा में आज भी वही आत्मीयता तैरती है।
मैं उसे सहेजकर रखे हुए हूँ अपनी स्मृतियों में, अपनी लेखनी में।
ताकि जब मैं न रहूँ तब भी कोई उस गाडरवारा को पढ़ सके जो कभी था।
वह गाडरवारा जो केवल नक्शे में नहीं,
दिलों में बसता था।
✒️ सुशील शर्मा
(जिसकी स्मृतियों में आज भी जीवित है गाडरवारा की गलियों का वह आत्मीय संसार)
