
बच्चों पर पढ़ाई का बोझ लेकर समसामयिक, झकझोर देने वाला ‘शहरनामा’ प्रस्तुत है—
यह लेख दोष नहीं लगाता, आईना दिखाता है।
शहरनामा :
अठारह साल का बच्चा और बाहर लगी कोचिंग की नेमप्लेट
अठारह साल।
पूरा एक लोकतांत्रिक कार्यकाल।
इतने समय में सरकारें बदल जाती हैं,
पर घर में बच्चा “तैयार” नहीं हो पाता।
बच्चा पैदा हुआ तो हमने कहा—
“अभी तो छोटा है।”
फिर बोला—
“अभी खेलने दो।”
फिर कहा—
“अभी बोर्ड है, बाद में सोचेंगे।”
और एक दिन अचानक घोषणा हुई—
“अब यह युवा हो गया है।”
यह वही बच्चा है
जिसे कल तक दूध गर्म करके दिया जाता था,
और आज उससे पूछा जा रहा है—
“तुम ज़िंदगी में बनना क्या चाहते हो?”
शहर इस दृश्य से भरा पड़ा है।
घर में अठारह साल रहा बच्चा,
और लक्ष्य तय कराने के लिए
उसे बाहर कोचिंग में भेजा जा रहा है—
जैसे लक्ष्य कोई
ऑनलाइन कोर्स हो
जो घर में डाउनलोड नहीं हो पाया।
कोचिंग की नेमप्लेट टँगी है—
“यहाँ भविष्य बनाया जाता है।”
घर की दीवार पर कोई तख्ती नहीं—
“यहाँ बच्चे को समझा जाता है।”
सवाल बहुत सीधा है,
पर जवाब असुविधाजनक—
अगर बच्चा अठारह साल तक
हमारे साथ रहा,
तो फिर उसे “समझने” के लिए
हमें बाहर क्यों जाना पड़ा?
क्या उन अठारह सालों में
हमने उसे सिर्फ़ यह सिखाया—
कैसे अंक लाने हैं
कैसे दूसरों से आगे निकलना है
कैसे चुप रहकर दबाव सहना है
और यह सिखाना भूल गए—
वह क्या पसंद करता है
वह किससे डरता है
वह किस बात पर टूट जाता है
बच्चा कोचिंग नहीं हारता,
वह घर में हार मान चुका होता है।
कोचिंग बस अंतिम स्टेशन है,
जहाँ वह चुपचाप बैठकर
अपने आत्मविश्वास का पोस्टमॉर्टम करवाता है।
फिर एक दिन अख़बार की खबर आती है—
“प्रतिभाशाली छात्र ने आत्महत्या कर ली।”
प्रतिभाशाली?
तो फिर सवाल और बड़ा हो जाता है।
क्या प्रतिभा को
हमने केवल नंबरों तक सीमित कर दिया?
शहर में माता-पिता कहते हैं—
“हमने तो सब कुछ दिया।”
हाँ, दिया—
मोबाइल
सुविधा
फीस
तुलना
पर क्या दिया—
समय?
संवाद?
असफल होने की छूट?
अठारह साल में
हम बच्चे को यह नहीं बता पाए
कि उसका मूल्य
उसकी रैंक से ज़्यादा है।
फिर अचानक
उसे “मैच्योर” घोषित कर दिया गया,
जैसे मैच्योरिटी
जन्मदिन के केक से आती हो।
असल में बच्चा
मैच्योर नहीं हुआ,
हम संवाद में पिछड़ गए।
लक्ष्य घर में इसलिए तय नहीं हुआ
क्योंकि घर में
लक्ष्य पर बात ही नहीं हुई।
घर में पूछा गया—
“रिज़ल्ट कैसा आया?”
कभी नहीं पूछा गया—
“मन कैसा है?”
और जब मन टूट गया,
तो हमने उसे कोचिंग के
सहारे टिका दिया।
यह शहरनामा
कोचिंग के खिलाफ़ नहीं है,
यह कोचिंग से पहले के अठारह सालों पर सवाल है।
क्योंकि अगर घर में
बच्चा सुना गया होता,
तो बाहर उसे
खुद को साबित करने की
आत्मघाती ज़रूरत नहीं पड़ती।
शहर को अब यह तय करना होगा—
हम बच्चे को
करियर की फ़ाइल बना रहे हैं
या
जीवित इंसान।
क्योंकि
जो घर में नहीं समझा गया,
वह कोचिंग में नहीं बचता।
दासानुदास चेदीराज दास
