भगवत भक्ति के लिए भौतिक सुख की व्याख्या श्रीकृष्ण को केंद्र में रखते हुए, सरल भाषा, दैनिक जीवन के उदाहरण और भगवद्गीता के श्लोकों के साथ कुछ दिन—ताकि यह उपदेश नहीं, समझ लगे।
भौतिक सुख क्या है..? — कृष्ण की दृष्टि से
भगवान श्रीकृष्ण गीता में मनुष्य को डाँटते नहीं,
वे उसे आईना दिखाते हैं।
भौतिक सुख वह है जो—
शरीर से शुरू होता है
इन्द्रियों से गुजरता है
मन में थोड़ी देर टिकता है
और अंत में थकान, तृष्णा या खालीपन छोड़ जाता है
कृष्ण इसे सुख का भ्रम कहते हैं, वास्तविक सुख नहीं।
इन्द्रिय-संपर्क से उत्पन्न सुख
गीता का श्लोक
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
(गीता 5.22)
सरल अर्थ
इन्द्रियों और विषयों के मेल से जो सुख मिलता है,
वह वास्तव में दुःख की जननी है।
उसका आरंभ भी है और अंत भी—
इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति उसमें रमण नहीं करता।
आज का उदाहरण
नया मोबाइल → कुछ दिन खुशी → फिर नया मॉडल चाहिए
स्वादिष्ट भोजन → पेट भरते ही अरुचि
प्रशंसा → थोड़ी देर गर्व → फिर और अपेक्षा
श्रीकृष्ण कहते हैं:
जिस सुख की एक्सपायरी डेट हो, वह आत्मा को कैसे तृप्त करेगा?
भौतिक सुख शुरुआत में मीठा, अंत में कड़वा
गीता का श्लोक
यत्तदग्रेऽमृतोपमं परिणामे विषमिव।
तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥
(गीता 18.38)
सरल अर्थ
जो सुख शुरुआत में अमृत जैसा लगता है,
पर अंत में विष बन जाता है—
वह राजस सुख है।
उदाहरण
रिश्ता केवल आकर्षण पर टिका हो → टूटने पर पीड़ा
अत्यधिक काम और सफलता → बाद में तनाव और रोग
नशा → पहले राहत, फिर लत
श्रीकृष्ण बताते हैं—
भौतिक सुख वादा बहुत करता है, देता बहुत कम है।
भौतिक सुख से तृष्णा बढ़ती है, शांति नहीं
गीता का श्लोक
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥
(गीता 3.38)
भावार्थ
जैसे—
आग धुएँ से ढँक जाती है
दर्पण धूल से
गर्भ झिल्ली से
वैसे ही आत्मा का ज्ञान
कामना रूपी धुएँ से ढँक जाता है।
उदाहरण
अधिक कमाने की चाह → समय नहीं बचता
अधिक भोग → संवेदनशीलता खत्म
अधिक सुविधा → सहनशक्ति घटती
श्रीकृष्ण कहते हैं:
भोग आत्मा को नहीं, केवल इच्छाओं को मोटा करता है।
कृष्ण क्यों भौतिक सुख से सावधान करते हैं?
कृष्ण संन्यास नहीं सिखाते,
वे सही दिशा सिखाते हैं।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
(गीता 2.14)
सरल अर्थ
सुख-दुःख शरीर और इन्द्रियों के संपर्क से आते-जाते रहते हैं।
वे स्थायी नहीं हैं—
इसलिए उन्हें सहन करना सीखो।
संदेश साफ है—
जो आता-जाता रहे, उसके पीछे आत्मा को मत दौड़ाओ।
कृष्ण का समाधान क्या है?
कृष्ण यह नहीं कहते—
“सुख मत लो”
वे कहते हैं—
“सुख का स्रोत बदलो”
भौतिक सुख = मैं केंद्र में
भक्ति सुख = कृष्ण केंद्र में
जहाँ कृष्ण केंद्र में आते हैं—
वही कर्म सेवा बन जाता है
वही सुख शुद्ध हो जाता है
वही जीवन हल्का हो जाता है
सार एक पंक्ति में
भौतिक सुख इन्द्रियों को छूता है,
कृष्ण-चेतना आत्मा को।
दासानुदास चेदीराज दास

