पंडित प्रदीप मिश्रा ने आरएसएस को लेकर क्या गलत कहा, फिर जो रुपया उनके पास है तो वो श्रद्धा, दान और भक्तों की भावना है, इस पर कांग्रेस को क्या आपत्ति है ?
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भावनाओं का ज्वार तब और तीव्र हो जाता है, जब कोई आस्थावान व्यक्ति राष्ट्रसेवा को ईश्वर-आराधना के समकक्ष रखता है। भारतीय समाज में यह भाव नया नहीं है। देश के लिए समर्पण, त्याग और सेवा को धर्म का ही विस्तार माना गया है। इसी सांस्कृतिक चेतना के संदर्भ में प्रसिद्ध कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा का वक्तव्य आया, जिसे कांग्रेस ने राजनीतिक चश्मे से देखकर विवाद का रूप देने की कोशिश की है। संघ के समर्थन में कही गई एक भावनात्मक उपमा को लेकर जिस तरह का हल्ला मचाया जा रहा है, वस्तुत: वह कांग्रेस की उसी पुरानी मानसिकता को उजागर करता है, जो राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विचारों से असहज रहती आई है।
दरअसल एक कार्यक्रम के दौरान पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि जैसे भगवान शिव विष पीकर सृष्टि की रक्षा करते हैं, वैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र की रक्षा में संलग्न है। यह कथन देखा जाए तो त्याग और संरक्षण की भावना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। किसी को ये नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय परंपरा में उपमा और रूपक के माध्यम से विचार रखने की परिपाटी रही है, किंतु कांग्रेस ने इसे जानबूझकर ‘धर्म से खिलवाड़’ और ‘चाटुकारिता’ का नाम दे दिया। सवाल यह है कि क्या संघ की तुलना किसी सेवा-भाव से करना अपराध हो गया है या कांग्रेस को समस्या सिर्फ इसलिए है क्योंकि बात संघ के पक्ष में कही गई?
कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता डॉक्टर विक्रम चौधरीद्वारा पंडित प्रदीप मिश्रा पर अकूत धन, प्लास्टिक के रुद्राक्ष और बिजनेस का आरोप लगाना वास्तव में आज विषय से ध्यान भटकाने का प्रयास है। यदि किसी कथावाचक को श्रद्धालुओं द्वारा दान दिया जाता है तो वह भक्तों की स्वेच्छा और आस्था का परिणाम है। उसी आस्था से मंदिर चलते हैं, धर्मशालाएं बनती हैं और सेवा कार्य होते हैं। कांग्रेस को यह तकलीफ क्यों है कि लोग अपनी श्रद्धा से किसे दान दें? क्या कांग्रेस अब आस्था का भी ऑडिट करेगी?
जहां तक संघ की बात है, तो उसे किसी कथावाचक के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं। संघ के सेवा कार्य देश के हर कोने में, हर आपदा में और हर कठिन समय में दिखते रहे हैं। 1947 के विभाजन के समय शरणार्थियों की सेवा से लेकर 1962 के युद्ध में सैनिकों के लिए रक्तदान, 1977 के आंध्र चक्रवात, 2001 के भुज भूकंप, 2013 की केदारनाथ त्रासदी और हाल के वर्षों में कोरोना महामारी के दौरान लाखों स्वयंसेवकों का सेवा में जुटना किसी से छिपा नहीं है। सेवा भारती, आरोग्य भारती, भारतीय मजदूर संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विवेकानन्द केंद्र, किसान संघ जैसे अनेक संघ प्रेरित संगठनों के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वावलंबन के देश भर में हजारों प्रकल्प चल रहे हैं। वनवासी कल्याण आश्रम आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य का काम कर रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रभाव जागृत करने से लेकर सामाजिक समरसता के प्रयास संघ की निरंतर पहचान रहे हैं।
कांग्रेस को शायद यही अखरता है कि संघ बिना सत्ता में रहते हुए समाज में विश्वास और स्वीकृति प्राप्त करता है। इसलिए जब कोई सार्वजनिक मंच से संघ की भूमिका को सकारात्मक रूप में रखता है तो उसे यह ‘धर्म का धंधा’ और ‘सत्ता की चाटुकारिता’ कहकर बदनाम करने की कोशिश होती है। महाकाल के नाम पर डर दिखाना भी उसी हताशा का प्रमाण है। वास्तव में आज कांग्रेस को यह समझना होगा कि आस्था भय से नहीं, भाव से चलती है, और यह भाव करोड़ों स्वयंसेवकों के निस्वार्थ कार्यों से उपजता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पंडित प्रदीप मिश्रा ने न तो किसी नेता को भगवान कहा, न किसी संगठन को ईश्वर घोषित किया। उन्होंने केवल राष्ट्ररक्षा के भाव को शिव-तत्व से जोड़कर समझाने का प्रयास किया। इसे पाप बताना या हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ कहना एक तरह से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हिंदू समाज की समझ पर प्रश्नचिह्न लगाना है। हिंदू समाज उपमा और प्रतीक समझने में सक्षम है, उसे कांग्रेस के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं।
अंततः यह पूरा विवाद कांग्रेस की वैचारिक असहजता का परिणाम है। संघ के सेवा, संस्कार और राष्ट्रनिष्ठा के कार्यों को नकार पाना अब संभव नहीं, इसलिए भावनात्मक वक्तव्यों को तोड़-मरोड़ कर हमला किया जा रहा है। देश का जनमानस देख रहा है कि कौन आस्था और सेवा को जोड़ रहा है और कौन उसे राजनीति की संकीर्णता में घसीट रहा है। आज वास्वत में जो दिख रहा है, वह यही है कि संघ अपनी साधना और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ता रहेगा और कांग्रेस ऐसे ही मुद्दों पर हल्ला मचाकर अपनी हताशा प्रकट करती रहेगी!