
दयारामजी और उनकी पत्नी को सुबह सुबह ही पीले वस्त्रों में देखा तो हमसे रहा ना गया और उनसे पूछ ही लिया –
अरे दयारामजी आज ये वेलेंटाइन-डे के मौसम में लाल कपड़ों की जगह आप दोनों पीले कपड़े पहन कर कहाँ चले? किसी पार्टी का प्रचार करने निकले है क्या? यदि किसी अन्य राजनैतिक पार्टी वालों ने देख लिया तो कहीं आपको सांप्रदायिक ही घोषित ना कर दें ?
दयारामजी उनके सीधेसाधे अंदाज में ही बोले – हम नहीं जानते ये बेलेनटेन-डे-वे वगैरह, हमारे लिए तो बसंत पंचमी के दिन से बसंतोत्सव का प्रारम्भ होता है और इसीलिए पीले कपड़े पहनकर माँ सरस्वती की पूजा करने मंदिर जा रहे है।
हम उन्हे फिर समझाने की कोशिश में बोले कि आजकल तो पूरे देश में चौदह फरवरी को हर वर्ष केवल प्रेम का संदेश देने वाला वेलेंटाइन-डे ही मनाया जाता है। यह दिन प्रेमी-प्रेमिका के लिए बड़ा ही विशेष दिन होता है। ऐसा माना जाता है कि यदि प्रेमिका को इस दिन गुलाब का फूल नहीं चढ़ाया गया तो वह अपने प्रेमी का प्रेम अस्वीकार कर सकती है, साथ ही यदि किसी ओर ने उसे वह लाल फूल दे दिया तो अपने पहले प्रेमी से ब्रेक-अप लेकर दूसरे प्रेमी का प्रेम-विनय भी स्वीकार कर सकती है। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आजकल राजनैतिक दलों के बीच चल रहा है जिस पार्टी ने प्रेम से फूल दिया उसी के साथ गठबंधन हो गया। ब्रेक-अप की जोखिम कोई नहीं लेना चाहता है इसीलिए आज के दिन गुलाब के एक-एक फूल की कीमत रु 100 से लेकर रु 500 तक होती है। वेलेंटाइन-डे पर गुलाब ऐसे बिकते हैं जैसे सावन में बिल्ब पत्र या पेपर लीक होने पर उसकी प्रतियाँ।
देश के बेरोजगार युवक युवतियों के पास नौकरी के आवेदन शुल्क की व्यवस्था भले ही ना हो किन्तु वे इस दिन गुलाब खरीदने के लिए अपने बेरोजगारी भत्ते को जरूर बचा कर रखते है। कई बेरोजगार तो इस दिन एक पंथ दो काज कर लेते हैं, गुलाब के फूल बेचकर जहां कमाई कर लेते हैं वहीं बचे हुए फूल अपनी प्रेमिका को चढ़ा देते है या भेंट कर देते हैं। एक राजनैतिक पार्टी ने तो फूल की जगह बाकायदा मुहब्बत की दुकान ही खोल रखी है, ये बात अलग है कि उनके युवराज से आज तक किसी प्रेमिका ने गुलाब का फूल स्वीकार नहीं किया है।
जिस प्रेमी या प्रेमिका को यह फूल मिलता है वह इसे अपने पर्स में, किताब में या अलमारी में बहुत ही संभाल कर रखता है। जो प्रेमी गुलाब का फूल अपनी प्रेमिका को देने में सफल हो जाता है वह ऐसा अनुभव करता है जैसे सीमा पर तैनात सैनिक कोई युद्ध जीतकर आया हो। क्योंकि कई स्थानों पर कुछ सामाजिक संस्थाएं और कुछ दलविशेष के युवक, प्रेमी प्रेमिकाओं को दौड़ाते हुए या मारते हुए और फूल तथा उपहार छीनते हुए इस पर्व का घोर विरोध करते दिखाई देते है यद्यपि बाद में उनमें से ही कई अपनी प्रेमिकाओं को यही छीने हुए फूल भेंट करते भी नजर आते हैं।
दयारामजी बोले – यही तो हो रहा है हमारे देश में कि हम अपनी ही समृद्ध संस्कृति को भूलकर विदेशी संस्कृति अपना रहे है। केवल एक दिन वेलेंटेन-डे मनाकर झूठ-मूठ का प्यार जताने से क्या होगा। अब इन युवाओं को कौन समझाये कि बसंत पंचमी से होली तक हमारे देश में बसंतोत्सव मनाने की परंपरा थी। इस समय शीतऋतु का ठंडा मौसम प्रायः समाप्त हो जाता है और बसंत-ऋतु में मौसम बहुत सुहावना हो जाता है, इसीलिए इसे ऋतुराज भी कहते है। राग रंग और उत्सव मनाने के लिए यह ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
यही समय फसलों के पकने का समय भी होता है, देश में कहीं सरसों में पीले-पीले फूल तो कहीं गेहूं की पकी बालियो की सुनहरी चादर ओढ़े खेत, कहीं आम के पेड़ों पर सजे बौर तो कहीं पलाश और गुलमोहर की लालिमा के दृश्य मन को हर्षित करते है। बसंत पंचमी को नवीन ऋतु के आगमन का दिन भी माना जाता है।
उनकी बात सुनकर मैंने उनसे कहा – अब छोड़िए भी ये पुरानी बातें, थोड़ा जमाने के साथ चलिये, जब हम हिन्दी और संस्कृत को छोडकर अङ्ग्रेज़ी बोल रहे है, राष्ट्रीय खेलों को छोड़कर हम क्रिकेट खेल रहे है, जब स्कूलों और न्यायालयों में आज भी बेवजह गर्मी की छुट्टियाँ दी जा रही है, नई पीढ़ी हमारे नए वर्ष गुड़ी पड़वा (वर्ष प्रतिपदा) के स्थान पर 31 दिसम्बर की रात को नया वर्ष मना रही है, तब आपके यह वेलेंटाइन-डे मनाने-ना-मनाने से क्या फर्क पड़ता है।
मेरी बात सुनकर वे मुस्कुराए और मंदिर की ओर बढ़ गए।
रचयिता
सुरेश रायकवार, इंदौर
