अभी हाल में इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक निर्णय आया कि अपराधियों का एनकाउंटर। नही होना चाहिए।अपराधियों को दंड देना न्यायालय का अधिकार है।ये ठीक है कि अपराधियों का एनकाउंटर नही होना चाहिए लेकिन अपराधी जब हथियार लेकर पुलिसकर्मियों पर हमला कर तो क्या पुलिसकर्मियों को चुपचाप उनकी गोलियों का शिकार हो जाना चाहिए या अपनी आत्मरक्षा में अपराधियों पर गोली नही चलाना चाहिए।ये सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि दुर्दांत अपराधियों के साथ क्या किया जाना चाहिए।आज देश के न्यायालय में लाखों केस पेंडिंग है।लाखों केस ऐसे हैं जिसमें महीनों से कोई सुनवाई ही नही हुई है।जब न्यायालय द्वारा केस का निपटारा ही नही होता है तो आप अपराधियों को दंड क्या दोगे।जघन्य अपराधों में भी व्यक्ति पैसे के दम पर जमानत हासिल कर लेता है।अपराधी जमानत मिलने के बाद और बड़ा अपराधी बन जाता है।उत्तरप्रदेश जहाँ के न्यायालय ने ये टिप्पणी दी है वहाँ योगी आदित्यनाथ के शासनकाल के पहले केवल अपराधियों का राज रहता था।उत्तरप्रदेश में आये दिन दंगे हुआ करते थे।योगी आदित्यनाथ के आने के बाद वहाँ दंगों पर लगाम लगी।मुख्तार अंसारी से लेकर अतीक अहमद जैसे दुर्दान्त अपराधियों का सफाया हो गया।अभी उत्तरप्रदेश में कानून का राज फिर से कायम हो गया है।योगी का बुलडोजर इंसाफ का पर्याय बन गया है।कोर्ट ने बुलडोजर की कार्यवाही पर भी रोक लगा दिया है जबकि ये बहुत जरूरी था।अपराधियों और दंगाइयों में इसका दर पैदा होने लगा था।लेकिन एक झटके में कोर्ट के आदेश ने सब तहस नहस कर दिया।अपराधियों जब तक डर नही हो तबतक वे अपराध करते ही जायेंगे।अपराध करने वालों के डी एन ए में ही खराबी होती है।अपराधी हमेशा अपराधी रहेगा।कुछ लोग परिस्थितियों के कारण आवेश में अपराधी बन जाते हैं और उनको सुधारा भी जा सकता है लेकिन उनकी संख्या नगण्य होती है लेकिन ज्यादातर अपराधी जिनके खून में ही अपराध करना लिखा रहता है और उनको किसी भी हाल में सुधारा नही जा सकता है।उनका एक ही उपाय है सिर्फ मौत की सजा देना।दुर्दान्त अपराधियों की संख्या जनसंख्या के हिसाब से नगण्य होती है लेकिन उनके कारण समाज में दहशत का माहौल रहता है।इसलिए ऐसे अपराधियों को मार देना ही उचित है।कुत्ता जब पागल हो जाता है तो उसे मारना ही पड़ता है उसी तरह मनुष्य भी अपराधी हो जाये तो उसे मारने में ही भलाई है।दो चार अपराधियों के मारे जाने से समाज में कोई फर्क नही पड़ता है।बाकी लोग तो समाज में अमन चैन से रह सकें।दरअसल हमारे संविधान में ही बहुत त्रुटियाँ हैं।संविधान कई मामले में स्पष्ट नही है।उन्हीं त्रुटियों का फायदा उठाकर अपराधियों की बचने की गुंजाइश बन जाती है।क्या कारण है कि अरब के मुल्कों में अपराध नही के बराबर होता है।सोने की पोटली भी वहाँ सड़क पर छोड़ दो तो किसी को भी उठाने की हिम्मत नही होती है।वहाँ बलात्कार के केस नही होते हैं।लेकिन जहाँ भी लोकतंत्र है वहाँ अपराध की संख्या बढ़ी हुई मिलती है।कानून ऐसा होना चाहिए कि लोगों की हिम्मत नही हो कि उसको तोड़ सके।लेकिन ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि एक तो हमारा कानून लचीला है और उसपर ये तुर्रा कि कोर्ट के रुख के कारण उसमें और भी लचीलापन आ जाता है।ये भी ठीक है कि पुलिस के हाथ में ज्यादा अधिकार दे देने से उनमें मनमानी होने लगती है।बहुत से एनकाउंटर फर्जी होते हैं।बहुत बार इसमें निर्दोष लोगों के साथ ज्यादती होने की गुंजाइश बनी रहती है।पुलिस पर अंकुश तो जरूर होना चाहिए।इसके लिए पुलिसकर्मियों की बहाली में गुणवत्ता का ध्यान रखना चाहिए।मौजूदा स्थिति में देश में आधे से ज्यादा पुलिसकर्मी अयोग्य हैं।वे केवल नौकरी करने के लिए नौकरी करते हैं।सबसे पहले पुलिस भर्ती में केवल योग्यता के आधार पर चयन होना चाहिए और उसकी प्रक्रिया भी सख्त होनी चाहिए।पुलिस ही प्रशासन की रीढ़ होती है और उसपर ध्यान देना चाहिए।पुलिसकर्मियों में भ्रष्टाचार की गुंजाइश नही होनी चाहिए लेकिन वर्तमान में पूरे देश में सारे के सारे पुलिसकर्मी भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं।किस थाने में कितनी कमाई है उसपर वहाँ थानेदार की नियुक्ति होती है।थाने की कमाई ऊपर तक बांटी जाती है जिसमें उस विभाग के मंत्री तक शामिल रहते हैं।ईमानदार अधिकारी की महत्वपूर्ण जगह पर नियुक्ति ही नही होती है।ये स्थिति पूरे देश भर में लागू होता है।उत्तरप्रदेश जहाँ के मुख्यमंत्री ईमानदार हैं और उनके मातहत अधिकारी भी थोड़े बहुत ईमानदार है इसलिए वहाँ कानून का राज्य स्थापित होने लगा है लेकिन अगर न्यायपालिका उनके कार्य में अड़ंगा डालेगा तो इससे वहाँ की कानून व्यवस्था बिगड़ने की संभावना बढ़ जाएगी।बहुत मुश्किल से उत्तरप्रदेश में एक ईमानदार और कर्मठ मुख्यमंत्री मिला है उसके पहले उत्तरप्रदेश में कैसे कैसे लोग मुख्यमंत्री बने हैं जिसको लोगों ने भुगता है।अभी इस देश का सौभाग्य है कि देश के शीर्ष पर भी ईमानदार प्रधानमंत्री मौजूद है।लेकिन इसके बावजूद ये दुर्भाग्य कि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार यथावत व्याप्त है।आये दिन जब सरकारी अधिकारियों के आयकर या ईडी का छापा पड़ता है तो करोड़ों की नाजायज संपत्तियों का खुलासा होता है।निचले स्तर पर भ्रष्टाचार में कोई लगाम नही लग पाया है।सड़क पर आपको खुलेआम ट्रैफिक पुलिस भी घुस लेते दिखाई दे देंगे।दरअसल भारत के लोग भ्रष्टाचार को अपना चुके हैं।हम इसके अभ्यस्त हो चुके हैं।इसकी शुरुआत शीर्ष स्तर पर ही शुरू हो जाता है।जब मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तब ये कहा जाता है कि ये मंत्रालय मलाईदार है।इसका मतलब साफ है कि उस मंत्रालय में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार की गुंजाइश है।मलाईदार मंत्रालय पाने की होड़ मची रहती है।सेवा करना अगर उद्देश्य है तो मलाईदार मंत्रालय से किसी का क्या लेना देना है।उसी तरह आयकर विभाग से लेकर अबकारी विभाग तक जितने भी सरकारी विभाग हैं उसमें लोग सिर्फ भ्रष्टाचार से पैसे कमाने आते हैं।आबकारी विभाग का चपरासी भी करोड़पति बन जाता है।आज सरकारी विभाग के किसी भी अधिकारी के यहाँ रेड पड़े तो आप पाएंगे कि उसके यहाँ आय से ज्यादा की संपत्ति बरामद होगी।ये कटु सत्य है और इसे स्वीकार करना होगा।आज हमारे देश के न्यायालय पर बहुत बोझ है।न्यायालय में जजों की बहुत कमी है जिससे केस के निष्पादन में वर्षों लग जा रहा है।पुलिस अगर अपराधी को पकडती है तो उसके खिलाफ न्यायालय से त्वरित न्याय नही मिल पाता है।इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं।अगर पुलिस इस मामलों में सख्ती बरतती है तो न्यायालय को भी पुलिस का पक्ष भी देखना चाहिये।निर्दोष के प्रति कोई अन्याय नही हो इसकी जिम्मेदारी कोर्ट पर ही है।पुलिस और न्यायालय में आपसी सामंजस्य होना चाहिए।कुछ मामलों में न्यायालय को अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।लोकतंत्र यही धर्म है।
द्वारा डॉ संजय श्रीवास्तव महू700058
