कबीरा आप ठगाइए, और ना ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय॥
दयारामजी बचपन से ही कबीर के उपरोक्त दोहे से काफी प्रभावित रहे और उन्होने इसे अपने जीवन में शब्दशः क्रियान्वित भी किया। यही कारण रहा कि बेचारे बचपन से आज तक कभी मित्रों से तो कभी रिशतेदारों से, कभी व्यापारी से तो कभी नेताओं से और कभी-कभी तो साधुओं से भी लगातार ठगा ही ठगा रहें है। पिछले सप्ताह की ही बात है, वे पत्नी के साथ बाजार में एक दुकान पर गए, अभी दुकान में बैठे ही थे कि नौकर चमचमाते ग्लास में पानी लेकर आया, दयाराम जी के गले से पानी उतरा भी नहीं था कि दुकानदार ने बड़े आग्रह पूर्वक पूछा – “आप चाय कॉफी क्या लेंगे? अपना आदर सत्कार होते देख दयारामजी गदगद हो गए और बोले – “कुछ भी चलेगा”। उन्हे नहीं मालूम था कि इस आधा कप चाय की कीमत उन्हे कितनी चुकानी होगी। सामान लेकर जब घर पहुंचे और उनके पोते ने उसी सामान का भाव ऑनलाइन देखकर बताया तो वे ठगे से रह गए।
देश में इतने प्रकार की ठगी चल रही हैं कि बेचारे दयारामजी चाहकर भी ठगाने से बच नहीं पाते हैं – दिन भर मोबाइल पर विज्ञापन आते रहते है कभी फलाना ऑफर तो कभी धिकाना ऑफर। कहीं एक के साथ दो फ्री, तो कहीं 80% डिस्काउंट का ऑफर, कहीं बिना ब्याज किश्तों में भुगतान की पेशकश तो कहीं आकर्षक पैकेज का प्रस्ताव। भगवान कहलाने वाले देश के महान से महानतम खिलाड़ियों, फिल्मों के महानायकों द्वारा किए जा रहे भ्रामक विज्ञापन के फेर में, भोले-भाले दयारामजी लगभग रोज ही ठगाते हैं। कभी तेल में तो कभी साबुन में, कभी केसर वाले गुटखे में तो कभी चाय, मसाले, टूथपेस्ट और तूफानी ठंडे में। एक बार तो एक विज्ञापन देखकर वे ठंड में अंडर गारमेंट खरीद लाये, फिर बिना स्वेटर पहने तेज ठंड में बाजार चले गए। बेचारे! जैसे-तैसे ठिठुरते-ठिठुरते वापस घर पहुंचे।
ओल्ड-एज दयारामजी ने नौकरी में वेतन-भत्तों का पैकेज तो सुना था किन्तु हैरानी और आश्चर्य उन्हे तब हुआ जब हॉस्पिटल की मृत्युशैय्या पर पड़े मरीज के इलाज के लिए पैकेज ऑफर किया गया। और तो और पोते पोतियों के स्कूल कॉलेज की फीस, वकील की फीस, हलवाई(केटरर्स) का मेहनताना भी पैकेज के अंतर्गत भुगतान हो रहे है, यह सुनकर वे अचंभित रह गए।
बाजार में ठगी का सबसे वैध और संवैधानिक हथियार है एमआरपी, जिसके माध्यम से मामूली-से-मामूली लागत वाली चीजों के ऊंचे-ऊंचे दाम निर्धारित किए जाते है और फिर इन्ही दामों पर भारी-भरकम डिस्काउंट देकर जनता को ठगा जाता है। आपके ठगाने की सीमा यहीं समाप्त नहीं होती है, इसके आगे भी यदि आप सोचते हैं कि आपका बैंक बेलेंसे तो कम-से-कम सुरक्षित है, तो यह भी आपका भ्रम ही है। क्योंकि इसके लिए भी देश में साइबर-ठग इतने सक्रिय हैं कि वे आपको डिजिटल-अरेस्ट करके आपसे करोड़ों रुपये ठग सकते है, और आपके बैंक खाते में झाड़ू लगा सकते है। डिजिटल ठगाई के प्रकरणों में बैंक तथा पुलिस का सुरक्षा तंत्र एक लकवा-ग्रस्त मरीज की तरह असहाय सा देखता भर रह जाता है, कर कुछ नहीं पाता।
देश में, जबसे चुनाव आरंभ हुए हैं आदरणीय दयारामजी को सबसे अधिक नेताओं के झूठे और आकर्षक वादों ने ठगा है। नेताओं द्वारा उन्हे कभी महंगाई, तो कभी भ्रष्टाचार से मुक्ति, कभी राष्ट्र-भक्ति के लोकलुभावन नारों से तो कभी धर्म और जाति के नाम पर ठगा जाता रहा है। चुनावों में तो जनता को ठगने के लिए हमारे शातिर नेता, कभी अपने हाथ-पैर तुड़वाकर सहानुभूति अर्जित करते हैं तो कभी किसी नेता की मृत्यु पर सहानुभूति से वोट हासिल करते हैं। दिल्ली में तो एक नेता ने बेहद ईमानदार बनकर ठगा और रेकॉर्ड मतों से विजयी होने के बाद बेईमानी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये। किन्तु क्या करें उन्हे तो कबीरजी के दोहे अनुसार ठगाने में ही सुख मिलता है।
दयारामजी जब भी बीमार होते हैं उन्हे डॉक्टरों द्वारा गंभीर बीमारियों का डर बता कर अनावश्यक जाँचे करवाई जाती है, जाँचों की फीस में डॉक्टर साहब का भी कमीशन निर्धारित होता है। बड़े-बड़े कार्पोरेट द्वारा संचालित अस्पतालों में तो डॉक्टरों को ऑपरेशन के टारगेट दिये जाते है। वे अपने मरीजों को मामूली-सी स्वास्थ्य समस्या के लिए भी ऑपरेशन की सलाह देकर ठगी की दुकान चला रहा है। अस्पताल के कमरों में होटल-नुमा सुविधाएं देकर खूब लूटा जा रहा है। आयुष्यमान बीमा योजना ने तो अस्पतालों में ठगी और लूट को दुगुना कर दिया है।
दयारामजी जब अपने पोते को स्कूल में भर्ती करवाने गए तो एक वर्ष की फीस-राशि (पैकेज) सुनकर उनके होश उड़ गए। इतनी राशि में तो उन्होने पढ़ाई-लिखाई के साथ ही, गाजे-बाजे के साथ बड़े धूम-धाम से अपनी सगाई भी कर ली थी। अङ्ग्रेज़ी माध्यम के इन कॉन्वेंट स्कूलों द्वारा भी खूब ठगी की जा रही है, बच्चों को स्कूल में नाश्ता और दोपहर के भोजन तथा स्पोर्ट्स के नाम पर भारी फीस वसूल की जाती है, बच्चों का पढ़ाई पर कम और खाने पर ज्यादा ध्यान होता है, यही कारण है कि बच्चों के दिमाग की बजाए वजन अधिक बढ़ता जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि देश में केवल दयारामजी ठगा रहे हैं, कबीरदास जी के दोहे का असर सरकारों पर भी देखने को मिलता है। अब देखिये ना संबंध सुधारने के चक्कर में हमारी सरकारें पाकिस्तान से कई बार ठगा चुकीं हैं। हर बार उस नापाक की चिकनी-चुपड़ी बातों से ठगा जाती है तथा परिणाम में कभी युद्ध तो कभी आतंकवादी घटनाओं का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार हमने ट्रम्प को चुनाव जिताने के लिए क्या-क्या नहीं किया वैल्कम ट्रम्प पर करोड़ों फूँक दिये किन्तु ट्रम्प ने हमारे देश पर ही अधिकतम टेरीफ़ जड़ दिया।
आखिर में परेशान होकर बेचारे दयारामजी साधुओं के पास गए, किन्तु वहाँ से भी ठगा के ही घर को लौटे।
रचयिता
सुरेश रायकवार
152 ए गोयल नगर इंदौर,
ईमेल – sandhysur@gmail.com मोब 8818838007
