नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) (Securities and Exchange Board of India + SEBI) ने म्यूचुअल फंड (Mutual Fund ) से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किए हैं। इसका मकसद पारदर्शिता बढ़ाना, निवेशकों के हितों की सुरक्षा करना और फंड हाउसों में बेहतर गवर्नेंस सुनिश्चित करना है। ये नए नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।
क्या हैं नए नियम?
नए नियमों के तहत म्यूचुअल फंड योजनाओं के खर्च ढांचे में अहम बदलाव किए गए हैं। म्यूचुअल फंड योजनाएं अब अपने प्रदर्शन से जुड़ा बेस एक्सपेंस रेशियो वसूल सकेंगी। सेबी ने स्पष्ट किया है कि जो योजनाएं प्रदर्शन आधारित बेस एक्सपेंस रेशियो लेने का विकल्प चुनेंगी, उन्हें बोर्ड द्वारा समय-समय पर तय किए गए खर्च ढांचे और डिस्क्लोजर नियमों का पालन करना होगा। इसके अलावा कुल खर्च को अलग-अलग हिस्सों में दिखाना अनिवार्य होगा। इसके अलावा ब्रोकरेज सीमा में भी सेबी ने कटौती की है। कैश मार्केट में ब्रोकरेज की अधिकतम सीमा को घटाकर 6 बेसिस पॉइंट कर दिया गया है। वहीं डेरिवेटिव सेगमेंट में नेट ब्रोकरेज कैप को 3.89 बेसिस प्वाइंट से घटाकर 2 बेसिस प्वाइंट कर दिया गया है।
इसके अलावा पहले ब्रोकरेज, सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT), स्टांप ड्यूटी और एक्सचेंज फीस जैसे खर्च टोटल एक्सपेंस रेशियो (TER) में शामिल रहते थे। वहीं अब इन्हें अलग-अलग दिखाना होगा। नया बेस एक्सपेंस रेशियो केवल एसेट मैनेजमेंट कंपनी द्वारा निवेशकों का पैसा मैनेज करने के लिए ली जाने वाली फीस को दिखाएगा। इसके अलावा, सेबी ने ट्रस्टी और प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों (KMPs) की जिम्मेदारियों को भी बढ़ाया है। इससे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों पर निगरानी और जवाबदेही और सख्त होगी, जिससे गवर्नेंस मानकों को मजबूती मिलेगी।
शेयर बाजार में बदलाव के भी प्रस्ताव
हाल ही में सेबी ने शेयर बाजारों में कारोबार से संबंधित ढांचे में बड़े बदलाव का प्रस्ताव किया। इसका मकसद नियमों को सरल बनाना, दोहराव को हटाना और बाजार सहभागियों के लिए अनुपालन के बोझ को कम करना है। ये प्रस्ताव शेयर बाजारों और जिंस वायदा-विकल्प बाजारों में कारोबारी सुगमता बढ़ाने की सेबी की व्यापक पहल का हिस्सा हैं।
