इस मामले की जांच विशेष जांच दल SIT द्वारा की गई थी। फरवरी 2015 में SIT ने शिकायतों के आधार पर सज्जन कुमार के खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की थीं। पहली एफआईआर जनकपुरी इलाके से संबंधित थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 1 नवंबर 1984 को सोहन सिंह और उनके दामाद अवतार सिंह की हत्या कर दी गई थी। दूसरी एफआईआर विकासपुरी की घटना से जुड़ी थी जिसमें आरोप था कि 2 नवंबर 1984 को गुरबचन सिंह को कथित तौर पर जिंदा जला दिया गया।अभियोजन पक्ष का दावा था कि इन दोनों घटनाओं के दौरान सज्जन कुमार की भूमिका भीड़ को भड़काने में रही, जबकि बचाव पक्ष ने आरोपों को निराधार बताते हुए सबूतों की कमी की बात कही। अदालत ने सभी दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण मौजूद नहीं हैं।
गौरतलब है कि सज्जन कुमार 1984 दंगों से जुड़े अन्य मामलों में पहले दोषी भी ठहराए जा चुके हैं और सजा काट रहे हैं। ऐसे में इस केस में बरी होने को उनके लिए एक बड़ी कानूनी राहत माना जा रहा है। हालांकि पीड़ित पक्ष और सिख संगठनों की ओर से इस फैसले पर नाराजगी जताए जाने की संभावना भी है।यह फैसला एक बार फिर 1984 दंगों से जुड़े मामलों में न्याय साक्ष्यों की मजबूती और लंबी न्यायिक प्रक्रिया को लेकर बहस को तेज कर सकता है। पीड़ित परिवारों के लिए यह मुद्दा आज भी बेहद संवेदनशील बना हुआ है।
